Passage 39.1
अन्नं ब्रह्मेत्येक आहुः । तन्न तथा । पूयति वा अन्नमृते प्राणात् । प्राणो ब्रह्मेत्येक आहुः । तन्न तथा । शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नात् । एते ह त्वेव देवते एकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतः । तद्ध स्माह प्रातृदः पितरम् । किं स्विदेवैवं विदुषे साधु कुर्यां किमेवास्मा असाधु कुर्यामिति । स ह स्माह पाणिना मा प्रातृद । कस्त्वेनयोरेकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति । तस्मा उ हैतदुवाच वीति । अन्नं वै वि । अन्ने हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि । रमिति । प्राणो वै रम् । प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते । सर्वाणि ह वा अस्मिन् भूतानि विशन्ति । सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एवं वेद ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अन्नम् ब्रह्म इति एके आहुः; तत् न तथा [अस्ति] । प्राणात् ऋते अन्नम् पूयति वा । प्राणः ब्रह्म इति एके आहुः; तत् न तथा [अस्ति] । अन्नात् ऋते प्राणः शुष्यति वै । एते ह तु एव देवते एकधाभूयम् भूत्वा परमताम् गच्छतः । प्रातृदः पितरम्, एवम्विदुषे किम् स्वित् एव साधु कुर्याम्; अस्मै किम् एव असाधु कुर्याम् इति तत् ह स्म आह । सः [पिता] पाणिना [निवारयन्], प्रातृद, मा [एवम् वोचः]; एनयोः एकधाभूयम् भूत्वा कः तु परमताम् गच्छति इति ह स्म आह । तस्मै उ ह एतत् उवाच—वि इति । अन्नम् वै वि [अस्ति]; अन्ने हि इमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि [सन्ति] । रम् इति [उवाच] । प्राणः वै रम् [अस्ति]; प्राणे हि इमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते । यः एवम् वेद, अस्मिन् सर्वाणि ह वा भूतानि विशन्ति; सर्वाणि भूतानि रमन्ते ।
हिन्दी अर्थ
कुछ कहते हैं, “अन्न ब्रह्म है।” वह इस तरह अकेले नहीं है, क्योंकि प्राण के बिना अन्न सड़ जाता है। कुछ कहते हैं, “प्राण ब्रह्म है।” वह भी इस तरह अकेले नहीं है, क्योंकि अन्न के बिना प्राण सूख जाता है। ये दोनों देवताएँ एक होकर परम अवस्था को पहुँचती हैं। इस विषय में प्रातृद ने अपने पिता से कहा, “इस प्रकार जानने वाले के लिए मैं कौन-सा भला कर सकता हूँ, और उसका कौन-सा बुरा कर सकता हूँ?” उन्होंने हाथ से संकेत करते हुए कहा, “नहीं, प्रातृद! इन दोनों के एक हो जाने पर कौन परम अवस्था को पहुँचता है?” तब उन्होंने उसे यह बताया: “वि।” अन्न ही वि है, क्योंकि ये सभी प्राणी अन्न में प्रविष्ट हैं। फिर कहा, “रम्।” प्राण ही रम् है, क्योंकि ये सभी प्राणी प्राण में रमते हैं। जो इस प्रकार जानता है, उसमें सभी प्राणी प्रवेश करते हैं और सभी प्राणी रमते हैं।
English meaning
Some say, “Food is Brahman.” That is not so when taken by itself, for food decays without breath. Some say, “Breath is Brahman.” That too is not so when taken by itself, for breath withers without food. These two divinities, becoming one, attain the highest condition. About this, Pratrda said to his father, “What good could I do for one who knows in this way, and what harm could I do to such a person?” With a gesture of the hand he said, “No, Pratrda! Who attains the highest condition through these two becoming one?” Then he explained to him: “Vi.” Food is vi, since all these beings have entered into food. He said, “Ram.” Breath is ram, since all these beings delight in breath. All beings enter into one who knows in this way, and all beings delight in that person.
व्याख्या
वि को विश्, प्रवेश करना, और रम् को रमना से जोड़ा गया है। दोनों ध्वनियाँ अन्न और प्राण की सहकारी भूमिकाएँ समझाती हैं। पिता का हाथ से संकेत और प्रश्न अत्यन्त संक्षिप्त हैं; उत्तर की व्याख्या को निश्चित कथानक मानकर विस्तार नहीं दिया गया है। अन्न-प्राण का यह चिन्तन कोई उपवास या श्वसन-चिकित्सा नहीं सिखाता।
Explanation
Vi is associated with entering, and ram with delighting. The two sounds explain the complementary roles of food and breath. The father’s hand gesture and question are very compressed, so the exchange has not been expanded into a supposedly certain narrative. The contemplation is not a fasting regimen or breathing treatment.
संदर्भ
अन्न और प्राण की अलग-अलग सर्वोच्चता को अस्वीकार कर पाठ उनके संयुक्त आश्रय को रखता है। बीच में प्रातृद और उनके पिता का संक्षिप्त, कठिन संवाद आता है।
Context
The passage rejects the isolated supremacy of food and breath and presents their union instead. A compact and difficult exchange between Pratrda and his father interrupts the exposition.