Passage 24.21
तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दोऽपहतपाप्माभयं रूपम् । तद्यथा प्रियया स्त्रिया संपरिष्वक्तो न बाह्यं किं चन वेद नान्तरम् । एवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किं चन वेद नान्तरम् । तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामं रूपं शोकान्तरम् ॥ २१ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तत् वा अस्य एतत् अतिच्छन्दः [अतिच्छन्दम्, कामवर्जितम् इत्यर्थः] अपहतपाप्म अभयम् रूपम् [अस्ति] । तत् यथा प्रियया स्त्रिया संपरिष्वक्तः [पुरुषः] बाह्यम् किञ्चन न वेद, अन्तरम् [किञ्चन] न [वेद], एवम् एव अयम् पुरुषः प्राज्ञेन आत्मना संपरिष्वक्तः बाह्यम् किञ्चन न वेद, अन्तरम् [किञ्चन] न [वेद] । तत् वा अस्य एतत् आप्तकामम् आत्मकामम् अकामम् शोकान्तरम् रूपम् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
यह उसका कामना से परे, पाप्मन् से मुक्त, अभय रूप है। जैसे प्रिय स्त्री के आलिंगन में पुरुष न बाहर का कुछ जानता है, न भीतर का, वैसे ही प्राज्ञ आत्मा के आलिंगन में यह पुरुष न बाहर का कुछ जानता है, न भीतर का। यही उसका आप्तकाम, आत्मकाम, अकाम और शोक से परे रूप है।
English meaning
This is its form beyond desire, free from affliction and fear. As a person embraced by a beloved woman knows nothing outside or inside, so this person, embraced by the knowing Self, knows nothing outside or inside. This is its form in which desire is fulfilled, the Self is its desire, and desire and grief are absent.
व्याख्या
यह स्नेहपूर्ण निकटता का रूपक है, कोई यौन साधना-विधि नहीं। आप्तकाम और अकाम विरोधी नहीं: जहाँ बाहरी कमी नहीं, वहाँ उसे भरने वाली इच्छा भी नहीं रहती।
Explanation
The embrace is an image of affectionate intimacy, not a sexual practice. Fulfilled desire and absence of desire are not contradictory here: where no lack is felt, no drive to fill it remains.
संदर्भ
आलिंगन की उपमा से विषय-भेद से परे विश्राम समझाया जाता है।
Context
An embrace illustrates rest beyond distinctions of objects.