Passage 7.1
दृप्तबालाकिर्हानूचानो गार्ग्य आस । स होवाचाजातशत्रुं काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति । स होवाचाजातशत्रुः सहस्रमेतस्यां वाचि दद्मः, जनको जनक इति वै जना धावन्तीति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
दृप्तबालाकिः अनूचानः गार्ग्यः ह आस । सः काश्यम् अजातशत्रुम् ह उवाच-[अहम्] ते ब्रह्म ब्रवाणि इति । सः अजातशत्रुः ह उवाच-एतस्याम् वाचि सहस्रम् दद्मः; जनकः जनकः इति वै जनाः धावन्ति इति ।
हिन्दी अर्थ
गर्ग-वंश के दृप्त बालाकि वेदों के विद्वान् थे। उन्होंने काशी के राजा अजातशत्रु से कहा: मैं आपको ब्रह्म बताऊँ। अजातशत्रु ने कहा: इस कथन मात्र के लिए हम एक हजार देते हैं; लोग तो “जनक, जनक” कहते हुए उन्हीं की ओर दौड़ते हैं।
English meaning
Dripta Balaki of the Gargya lineage was a learned reciter of the Veda. He said to Ajatashatru of Kashi, “Let me tell you about Brahman.” Ajatashatru replied, “For this very offer we give a thousand; people do keep running to Janaka, calling ‘Janaka, Janaka!’”
व्याख्या
अनूचान वैदिक अध्ययन और पाठ की विद्वत्ता बताता है; उससे ब्रह्म का पूर्ण ज्ञान स्वतः सिद्ध नहीं होता। राजा का जनक-सन्दर्भ विद्वानों को आश्रय देने की प्रतिष्ठा की ओर संकेत करता है। सहस्र के साथ वस्तु नहीं दी गई है, इसलिए अर्थ में गायों का नाम निश्चित रूप से नहीं जोड़ा गया।
Explanation
Anuchana indicates mastery of Vedic study and recitation, not automatically complete knowledge of Brahman. The reference to Janaka evokes a royal reputation for patronizing learning. Since the object of “a thousand” is unstated here, the rendering does not silently specify cows.
संदर्भ
दूसरे अध्याय का पहला संवाद बालाकि और काशी के राजा अजातशत्रु के बीच आरम्भ होता है। बालाकि पहले स्वयं को उपदेशक के स्थान पर रखते हैं।
Context
The second adhyaya opens with Balaki approaching Ajatashatru, king of Kashi. Balaki initially presents himself as the teacher.