Passage 24.16
स वा एष एतस्मिन् स्वप्ने रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव । स यत्तत्र किञ्चित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवति । असङ्गो ह्ययं पुरुष इति । एवमेवैतत्याज्ञवल्क्य । सोऽहं भगवते सहस्रं ददामि । अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः वा एषः एतस्मिन् स्वप्ने रत्वा चरित्वा पुण्यम् च पापम् च दृष्ट्वा एव, पुनः प्रतिन्यायम् प्रतियोनि बुद्धान्ताय एव आद्रवति । सः तत्र यत् किञ्चित् पश्यति, तेन अनन्वागतः भवति । हि अयम् पुरुषः असङ्गः [अस्ति] इति । [जनकः आह—] याज्ञवल्क्य, एतत् एवम् एव [अस्ति] । सः अहम् भगवते सहस्रम् ददामि । अतः ऊर्ध्वम् विमोक्षाय एव ब्रूहि इति ।
हिन्दी अर्थ
वह इस स्वप्न में रमकर, विचरकर और पुण्य-पाप को केवल देखकर फिर उलटे क्रम से अपने पूर्वस्थान, जाग्रत अवस्था, में लौटता है। वहाँ जो कुछ देखता है, उससे वह बँधा नहीं रहता, क्योंकि यह पुरुष असंग है। जनक ने कहा: याज्ञवल्क्य, यह ठीक है। मैं आपको एक हजार देता हूँ; आगे मुक्ति के लिए ही बताइए।
English meaning
Having enjoyed and ranged in dream, merely seeing good and evil, it returns by the reverse course to its former station, waking. Whatever it sees there does not attach to it, for this person is unattached. Janaka said, “That is so, Yajnavalkya. I give you a thousand; teach me further toward liberation.”
व्याख्या
स्वप्न में देखना और जाग्रत कर्म करना एक ही प्रकार का कर्मबन्ध नहीं माना गया। असंगता का आत्मदर्शन नैतिक उत्तरदायित्व मिटाने की अनुमति नहीं है।
Explanation
Dream-seeing is distinguished from performing a waking act. The account of the Self’s nonattachment is not permission to erase ethical responsibility.
संदर्भ
अब स्वप्न से जागरण में वापसी कही जाती है।
Context
The sequence now returns from dream to waking.