Passage 24.29
यद्वै तन्न स्पृशति स्पृशन् वै तन्न स्पृशति । न हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् । न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्स्पृशेत् ॥ २९ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यत् वै तत् [तत्र सः] न स्पृशति, स्पृशन् वै तत् [तत्र सः] न स्पृशति । हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेः अविनाशित्वात् विपरिलोपः न विद्यते । तु ततः [आत्मनः] अन्यत् विभक्तम् तत् द्वितीयम् न अस्ति, यत् [सः] स्पृशेत् ।
हिन्दी अर्थ
जब कहा जाता है कि वह नहीं छूता, तब वह छूने वाला होते हुए भी नहीं छूता। छूने वाला की छूने की शक्ति का लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। पर उससे अलग, विभक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं है जिसे वह अनुभव करे।
English meaning
When it is said that it does not touch, it is still touching, though not touching an object. The toucher’s capacity for touching is not lost, for it is imperishable. There is no second thing, separate and distinct from it, for it to touch.
व्याख्या
स्पर्श सबसे निकट का देहगत सम्बन्ध लगता है, पर यहाँ उसके लिए भी दूसरे विषय की आवश्यकता दिखाई गई है।
Explanation
Touch seems an especially immediate bodily relation, yet it too requires a second object.
संदर्भ
अद्वैत निद्रा में छूने की चर्चा की जाती है।
Context
The nondual-rest argument now concerns touching.