Passage 20.1
अथ ह वाचक्नव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ताहमिमं द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि । तौ चेन्मे विवक्ष्यति । न वै जातु युष्माकमिमं कश्चिद्ब्रह्मोद्यं जेतेति । पृच्छ गार्गीति ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ ह वाचक्नवी उवाच—ब्राह्मणाः भगवन्तः, हन्त अहम् इमम् द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि । चेत् [सः] मे तौ विवक्ष्यति, वै युष्माकम् [मध्ये] कश्चित् जातु इमम् ब्रह्मोद्यम् [प्रति] न जेता इति । [ब्राह्मणाः आहुः—] गार्गि, पृच्छ इति ।
हिन्दी अर्थ
तब वाचक्नवी ने कहा: आदरणीय ब्राह्मणो, मैं इनसे दो प्रश्न पूछूँगी। यदि ये उनका उत्तर दे देंगे, तो आपमें कोई भी इन्हें ब्रह्म-विवाद में कभी नहीं जीत सकेगा। याज्ञवल्क्य ने कहा: पूछो, गार्गी।
English meaning
Vachaknavi then said, “Revered Brahmins, I shall ask him two questions. If he answers them, none of you will ever defeat him in a debate on brahman.” Yajnavalkya said, “Ask, Gargi.”
व्याख्या
वह केवल निष्क्रिय श्रोता नहीं, परीक्षा की कठिनाई का मानक स्वयं तय करती हैं। ब्रह्मोद्य वैदिक ज्ञान पर सार्वजनिक प्रश्नोत्तर का नाम है।
Explanation
She is not a passive listener: she sets the standard of the test. Brahmodya denotes a formal contest of questions concerning sacred knowledge.
संदर्भ
गार्गी अपनी पहली प्रश्नशृंखला के बाद सभा में फिर बोलती हैं।
Context
Gargi returns to the assembly after her earlier sequence of questions.