Passage 24.2
याज्ञवल्क्य किंज्योतिरयं पुरुष इति । आदित्यज्योतिः सम्राडिति होवाच । आदित्येनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति । एवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[जनकः पप्रच्छ—] याज्ञवल्क्य, अयम् पुरुषः किंज्योतिः [अस्ति] इति । [याज्ञवल्क्यः] ह उवाच—सम्राट्, [अयम्] आदित्यज्योतिः [अस्ति] इति । अयम् आदित्येन एव ज्योतिषा आस्ते, पल्ययते, कर्म कुरुते, विपल्येति इति । [जनकः आह—] याज्ञवल्क्य, एतद् एवम् एव [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
जनक ने पूछा: याज्ञवल्क्य, इस पुरुष की ज्योति क्या है? सूर्य उसकी ज्योति है, सम्राट्। सूर्य के प्रकाश से ही वह बैठता है, बाहर जाता है, कर्म करता है और लौटता है। जनक ने कहा: याज्ञवल्क्य, यह ठीक है।
English meaning
Janaka asked, “Yajnavalkya, what is the light of this person?” “The sun, Your Majesty. By the sun’s light the person sits, goes out, acts and returns.” “That is so, Yajnavalkya.”
व्याख्या
बैठना, जाना, काम करना और लौटना जीवन की साधारण गतिविधियाँ हैं। इनसे पूछा जाता है कि अनुभव और व्यवहार को प्रकाशित करने वाला आधार क्या है।
Explanation
Sitting, going, acting and returning represent ordinary activity. They establish the question of what makes experience and action possible.
संदर्भ
ज्योति का प्रश्न बाहरी सूर्यप्रकाश से आरम्भ होता है।
Context
The inquiry into light begins with external sunlight.