Passage 4.1
आत्मैवेदमग्र आसीत्पुरुषविधः । सोऽनुवीक्ष्य नान्यदात्मनोऽपश्यत् । सोऽहमस्मीत्यग्रे व्याहरत् । ततोऽहंनामाभवत् । तस्मादप्येतर्ह्यामन्त्रितोऽहमयमित्येवाग्र उक्त्वाथान्यन्नाम प्रब्रूते यदस्य भवति । स यत्पूर्वोऽस्मात्सर्वस्मात्सर्वान् पाप्मन औषत्तस्मात्पुरुषः । ओषति ह वै स तं योऽस्मात्पूर्वो बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अग्रे इदम् पुरुषविधः आत्मा एव आसीत् । सः अनुवीक्ष्य आत्मनः अन्यत् न अपश्यत् । सः अग्रे अहम् अस्मि इति व्याहरत् । ततः अहंनामा अभवत् । तस्मात् अपि एतर्हि आमन्त्रितः अहम् अयम् इति एव अग्रे उक्त्वा अथ अस्य यत् अन्यत् नाम भवति [तत्] प्रब्रूते । सः अस्मात् सर्वस्मात् पूर्वः सर्वान् पाप्मनः औषत् यत्, तस्मात् पुरुषः [अभवत्] । यः एवम् वेद, सः अस्मात् पूर्वः बुभूषति यः, तम् ह वै ओषति ।
हिन्दी अर्थ
आरम्भ में यह सब पुरुषाकार आत्मा ही था। उसने चारों ओर देखकर अपने से भिन्न कुछ नहीं देखा। पहले उसने कहा: मैं हूँ। इसीलिए उसका नाम “अहम्” हुआ। आज भी किसी को बुलाने पर वह पहले “यह मैं हूँ” कहता है और फिर अपना दूसरा नाम बताता है। क्योंकि उसने इस सब से पहले सभी पाप्माओं को जला दिया, इसलिए वह पुरुष कहलाया। जो ऐसा जानता है, वह उससे आगे होना चाहने वाले प्रतिद्वन्द्वी को जला देता है, ऐसा पाठ कहता है।
English meaning
In the beginning this was the self alone, in a human-like form. Looking around, it saw nothing other than itself. It first declared, “I am.” Thus “I” became its name. Even now, when addressed, a person first says “It is I,” and then gives whatever other name they have. Because it burned all evils before all this, it was called purusha. The text says that one who knows this burns the rival who seeks to precede them.
व्याख्या
“मैं हूँ” नाम से पहले की आत्म-पहचान है। पुरुष को पूर्व और जलाने की क्रिया से जोड़ना पाठ की वैदिक शब्दव्याख्या है, आधुनिक व्युत्पत्ति नहीं। प्रतिद्वन्द्वी को जलाने की फलश्रुति उसी ऐतिहासिक अनुष्ठानिक भाषा का हिस्सा है; यह हिंसा करने की अनुमति नहीं।
Explanation
“I am” expresses self-recognition before a personal name. Deriving purusha through priority and burning is Vedic interpretive wordplay, not modern etymology. Burning a rival belongs to the historical language of promised ritual benefits, not permission for violence.
संदर्भ
चौथा ब्राह्मण आत्मा के पुरुषाकार रूप से एक नई सृष्टिव्याख्या शुरू करता है।
Context
The fourth brahmana begins a new account of creation with the self in a person-like form.