Passage 24.4
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते किंज्योतिरेवायं पुरुष इति । अग्निरेवास्य ज्योतिर्भवतीति । अग्निनैव ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति । एवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[जनकः पप्रच्छ—] याज्ञवल्क्य, अस्तमिते आदित्ये चन्द्रमसि अस्तमिते, अयम् पुरुषः किंज्योतिः एव [अस्ति] इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] अग्निः एव अस्य ज्योतिः भवति इति । [अयम्] अग्निना एव ज्योतिषा आस्ते, पल्ययते, कर्म कुरुते, विपल्येति इति । [जनकः आह—] याज्ञवल्क्य, एतद् एवम् एव [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
जनक ने पूछा: सूर्य और चन्द्रमा दोनों अस्त हो गए हों, तब इस पुरुष की ज्योति क्या है? अग्नि उसकी ज्योति होती है। अग्नि के प्रकाश से वह बैठता है, बाहर जाता है, कर्म करता है और लौटता है। जनक ने कहा: याज्ञवल्क्य, यह ठीक है।
English meaning
Janaka asked, “When both sun and moon have set, what is the person’s light?” “Fire. By fire’s light the person sits, goes out, acts and returns.” “That is so, Yajnavalkya.”
व्याख्या
अग्नि भी बाहरी प्रकाश है, पर सूर्य-चन्द्रमा के बिना उपलब्ध हो सकती है। अगले प्रश्न में उसे भी हटाया जाएगा।
Explanation
Fire remains an external light, but can be available without sun or moon. The next question removes this source too.
संदर्भ
आकाशीय प्रकाशों के बाद समीप की अग्नि का प्रकाश आता है।
Context
After celestial sources, the inquiry turns to fire nearby.