Passage 24.15
स वा एष एतस्मिन् संप्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति स्वप्नायैव । स यत्तत्र किञ्चित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवति । असङ्गो ह्ययं पुरुष इति । एवमेवैतत्याज्ञवल्क्य । सोऽहं भगवते सहस्रं ददामि । अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः वा एषः [पूर्वम् स्वप्ने] रत्वा चरित्वा पुण्यम् [पुण्यफलम्] च पापम् [पापफलम्] च दृष्ट्वा एव, एतस्मिन् संप्रसादे [सुषुप्ते स्थित्वा], पुनः प्रतिन्यायम् प्रतियोनि स्वप्नाय एव आद्रवति । सः तत्र यत् किञ्चित् पश्यति, तेन अनन्वागतः भवति । हि अयम् पुरुषः असङ्गः [अस्ति] इति । [जनकः आह—] याज्ञवल्क्य, एतत् एवम् एव [अस्ति] । सः अहम् भगवते सहस्रम् ददामि । अतः ऊर्ध्वम् विमोक्षाय एव ब्रूहि इति ।
हिन्दी अर्थ
यह पुरुष रमकर, विचरकर और पुण्य-पाप को केवल देख चुकने के बाद इस सम्प्रसाद, शान्त विश्राम, में पहुँचता है; फिर उलटे क्रम से अपने पूर्वस्थान, स्वप्न, की ओर लौटता है। वहाँ जो कुछ देखता है, उससे वह बँधा नहीं रहता, क्योंकि यह पुरुष असंग है। जनक ने कहा: याज्ञवल्क्य, यह ठीक है। मैं आपको एक हजार देता हूँ; अब आगे मुक्ति के लिए ही बताइए।
English meaning
After enjoying, ranging and merely seeing good and evil, this person reaches serene rest; it then returns by the reverse course to its former station, dream. Whatever it sees there does not attach to it, for this person is unattached. Janaka said, “That is so, Yajnavalkya. I give you a thousand; now teach me further toward liberation.”
व्याख्या
सम्प्रसाद को गहरी निद्रा समझते हुए प्राचीन भाष्य रमने-विचरने को उससे पूर्व के स्वप्न से जोड़ता है। यह वाक्य-क्रम व्याख्यात्मक है; शान्त निद्रा में वस्तुगत सुख-दुःख देखने का दावा न मानें।
Explanation
Reading samprasada as deep sleep, the ancient commentary relates enjoyment and ranging to the preceding dream. The translation follows that interpretive sequence rather than claiming object-directed experiences within dreamless rest.
संदर्भ
सम्प्रसाद से स्वप्न की ओर लौटने पर आत्मा के असंग रहने का विचार आता है।
Context
The return from serene rest to dream introduces the Self’s nonattachment.