Passage 3.5
अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यः श्रोत्रमुदगायत् । यः श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं शृणोति तदात्मने । तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति । तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन् । स यः स पाप्मा । यदेवेदमप्रतिरूपं शृणोति । स एव स पाप्मा ॥ ५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ ह श्रोत्रम् ऊचुः-त्वम् नः उद्गाय इति । तथा इति तेभ्यः श्रोत्रम् उदगायत् । यः श्रोत्रे भोगः [अस्ति], तम् देवेभ्यः आगायत् । यत् कल्याणम् शृणोति, तत् आत्मने [आगायत्] । ते [असुराः] अविदुः-अनेन वै उद्गात्रा [देवाः] नः अत्येष्यन्ति इति । तम् अभिद्रुत्य पाप्मना अविध्यन् । यः सः पाप्मा [आसीत्], सः यत् एव इदम् अप्रतिरूपम् शृणोति [तत् अस्ति] । सः एव सः पाप्मा [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
उन्होंने श्रोत्र से कहा: तुम हमारे लिए उद्गीथ गाओ। उसने स्वीकार करके उनके लिए उद्गीथ गाया। श्रवण से जो भोग मिलता है, वह देवताओं के लिए गाया; जो शुभ सुनता है, वह अपने लिए रखा। असुरों ने जान लिया: इस उद्गाता के द्वारा ये हमसे आगे निकल जाएँगे। उन्होंने उस पर धावा बोलकर उसे पाप्मा से बेध दिया। वह पाप्मा यही है कि वह अनुचित सुनता है; वही उसका दूषण है।
English meaning
They asked hearing, “Sing the udgitha for us.” It agreed and sang for them. Whatever enjoyment comes through hearing, it sang for the gods; whatever good it hears, it reserved for itself. The Asuras understood, “Through this chanter they will surpass us.” They rushed upon it and pierced it with evil. That evil is precisely its hearing what is unsuitable; this is its corruption.
व्याख्या
यह श्रोत्र की सीमितता का कथात्मक चित्र है। अप्रतिरूप ध्वनि सुनना केवल नैतिक दोष नहीं, बल्कि इन्द्रिय के सुखद और अप्रिय दोनों के लिए खुला होने का संकेत भी है।
Explanation
This is a narrative picture of hearing’s limitation. Hearing an unsuitable sound is not simply a moral fault; it also shows that a sense faculty is open to both pleasant and unpleasant experience.
संदर्भ
श्रवण के द्वारा उद्गीथ का चौथा प्रयास।
Context
The fourth attempt, through hearing.