Passage 3.2
ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यो वागुदगायत् । यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायत् । यत्कल्याणं वदति तदात्मने । तेऽविदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति । तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन् । स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं वदति । स एव स पाप्मा ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
ते ह वाचम् ऊचुः-त्वम् नः उद्गाय इति । तथा इति तेभ्यः वाक् उदगायत् । यः वाचि भोगः [अस्ति], तम् देवेभ्यः आगायत् । यत् कल्याणम् वदति, तत् आत्मने [आगायत्] । ते [असुराः] अविदुः-अनेन वै उद्गात्रा [देवाः] नः अत्येष्यन्ति इति । तम् अभिद्रुत्य पाप्मना अविध्यन् । यः सः पाप्मा [आसीत्], सः यत् एव इदम् अप्रतिरूपम् वदति [तत् अस्ति] । सः एव सः पाप्मा [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
उन्होंने वाणी से कहा: तुम हमारे लिए उद्गीथ गाओ। उसने स्वीकार करके उनके लिए उद्गीथ गाया। वाणी से जो भोग मिलता है, वह देवताओं के लिए गाया; जो शुभ बोलता है, वह अपने लिए रखा। असुरों ने जान लिया: इस उद्गाता के द्वारा ये हमसे आगे निकल जाएँगे। उन्होंने उस पर धावा बोलकर उसे पाप्मा से बेध दिया। वह पाप्मा यही है कि वह अनुचित बोलता है; वही उसका दूषण है।
English meaning
They asked speech, “Sing the udgitha for us.” It agreed and sang for them. Whatever enjoyment comes through speech, it sang for the gods; whatever good it says, it reserved for itself. The Asuras understood, “Through this chanter they will surpass us.” They rushed upon it and pierced it with evil. That evil is precisely its saying what is unsuitable; this is its corruption.
व्याख्या
यहाँ वाणी देवताओं के सामान्य लाभ के लिए गाती है, पर सुंदर बोलने का लाभ अपने लिए रखती है। अनुचित वचन उस शक्ति में प्रविष्ट दूषण का दृश्य रूप है।
Explanation
Speech sings for the gods’ shared benefit but reserves beautiful utterance for itself. Improper speech is the visible form of the corruption that enters this faculty.
संदर्भ
बोलने की शक्ति का पहला प्रयास।
Context
The first attempt, involving speech.