Passage 3.24
तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाच । अयं त्यस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदितोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति । वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥ २४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तत् ह अपि ब्रह्मदत्तः चैकितानेयः राजानम् [सोमम्] भक्षयन् उवाच—यदि इतः [वाक्प्राणात्मकात्] अन्येन अयास्यः आङ्गिरसः उदगायत्, [तर्हि] अयम् राजा त्यस्य [मम अनृतवादिनः] मूर्धानम् विपातयतात् इति । सः हि वाचा च प्राणेन च एव उदगायत् इति ।
हिन्दी अर्थ
इसी प्रसंग में चैकितानेय ब्रह्मदत्त ने सोमराज का पान करते हुए कहा: यदि अयास्य आङ्गिरस ने इस प्राण से भिन्न किसी के द्वारा उद्गीथ गाया हो, तो यह राजा उस कथन करने वाले का सिर गिरा दे। वास्तव में उसने वाणी और प्राण, दोनों के द्वारा गाया था।
English meaning
On this point Brahmadatta Caikitaneya, while drinking Soma the king, declared, “If Ayasya Angirasa sang the udgitha through anything other than this vital power, may this king strike off that person’s head.” For he sang through both speech and breath.
व्याख्या
राजा यहाँ सोम है, किसी मानव राजा को खाने की बात नहीं। कथन में सिर गिरने की शाप-जैसी भाषा अनुष्ठानिक सत्यप्रतिज्ञा की तीव्रता दिखाती है। इसका हिंसक शाब्दिक रूप छिपाया नहीं गया, लेकिन यह पाठक को किसी पर हिंसा करने का निर्देश नहीं है।
Explanation
The king here is Soma; the passage is not about eating a human king. The head-falling curse expresses the force of a ritual assertion of truth. Its violent wording is not concealed, but it is not a direction to a reader to commit violence.
संदर्भ
उद्गीथ की वाणी-प्राण व्याख्या को एक प्राचीन अनुष्ठानिक कथन से पुष्ट किया जाता है।
Context
An ancient ritual declaration reinforces the account of udgitha as speech together with breath.