Passage 21.9
तदाहुर्यदयमेक इवैव पवते । अथ कथमध्यर्ध इति । यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत्तेनाध्यर्ध इति । कतम एको देव इति । प्राण इति । स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥ ९ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तत् आहुः—यत् अयम् एकः इव एव पवते, अथ कथम् अध्यर्धः [उच्यते] इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] यत् अस्मिन् इदम् सर्वम् अध्यार्ध्नोत्, तेन अध्यर्धः [उच्यते] इति । [शाकल्यः पप्रच्छ—] एकः देवः कतमः [अस्ति] इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] प्राणः इति । सः ब्रह्म [अस्ति]; [तम्] त्यत् इति आचक्षते ।
हिन्दी अर्थ
लोग कहते हैं: यह वायु तो एक ही बहती है, फिर डेढ़ कैसे? क्योंकि इसमें यह सब बढ़ता और समृद्ध होता है, इसलिए इसे अध्यर्ध कहते हैं। एक देवता कौन है? प्राण। वही ब्रह्म है; उसे त्यत्, वह, कहा जाता है।
English meaning
People ask, “This wind seems to blow as just one; how is it one and a half?” “Because all this grows and prospers in it, it is called adhyardha.” “Which is the one god?” “Breath. It is brahman, referred to as tyat, ‘that.’”
व्याख्या
अध्यर्ध को अध्यार्ध्नोत्, बढ़ा या समृद्ध हुआ, से जोड़ना धार्मिक शब्दव्याख्या है। त्यत् दूरसूचक वैदिक सर्वनाम है; इसे किसी अतिरिक्त देवता का नाम न समझें।
Explanation
The connection of adhyardha with growing or prospering is interpretive wordplay. Tyat is a Vedic demonstrative, “that,” not an additional deity’s personal name.
संदर्भ
संख्या का क्रम प्राण और ब्रह्म की संगति पर समाप्त होता है।
Context
The numerical sequence ends with breath and brahman.