Passage 21.11
काम एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ । य एवायं काममयः पुरुषः स एषः । वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति । स्त्रिय इति होवाच ॥ ११ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[शाकल्यः आह—] याज्ञवल्क्य, यस्य कामः एव आयतनम्, [यस्य] हृदयम् लोकः, [यस्य] मनः ज्योतिः, सर्वस्य आत्मनः परायणम् तम् पुरुषम् यः वै विद्यात्, सः वै वेदिता स्यात् । [याज्ञवल्क्यः आह—] यम् आत्थ, सर्वस्य आत्मनः परायणम् तम् पुरुषम् अहम् वा वेद । यः एव अयम् काममयः पुरुषः, सः एषः [अस्ति] । शाकल्य, वद एव । [शाकल्यः पप्रच्छ—] तस्य का देवता इति । [याज्ञवल्क्यः] ह उवाच—स्त्रियः इति ।
हिन्दी अर्थ
शाकल्य ने कहा: जिसका आश्रय कामना, जिसका लोक हृदय और जिसकी ज्योति मन है, उस सम्पूर्ण व्यक्ति के परम आश्रय पुरुष को जो जाने, वही ज्ञाता हो, याज्ञवल्क्य। याज्ञवल्क्य ने कहा: तुम जिस सम्पूर्ण व्यक्ति के परम आश्रय पुरुष को कहते हो, उसे मैं जानता हूँ; वह यही कामनामय पुरुष है। शाकल्य, बताओ, उसकी देवता कौन है? शाकल्य ने कहा: स्त्रियाँ।
English meaning
Shakalya said, “One who knows the person whose abode is desire, whose world is the heart and whose light is mind, the final resort of the whole self, would indeed be a knower, Yajnavalkya.” Yajnavalkya replied, “I know that person, the final resort of the whole self, whom you describe: it is the person formed of desire. Tell me, Shakalya, what is its deity?” He answered, “Women.”
व्याख्या
स्त्रियों को कामनामय पुरुष की देवता कहना इस संवाद की पुरुषकेन्द्रित ऐतिहासिक दृष्टि है। इसे सभी स्त्रियों या सभी व्यक्तियों की इच्छाओं का सार्वभौम विवरण न माना जाए।
Explanation
Identifying women as the deity of a desire-formed male person reflects the passage’s historical male-centred perspective, not a universal account of women or of everyone’s desires.
संदर्भ
आठ पुरुषों की परीक्षा में कामनामय पुरुष का प्रश्न है।
Context
The eight-person examination now concerns the person formed of desire.