Passage 21.10
पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ । य एवायं शारीरः पुरुषः स एषः । वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति । अमृतमिति होवाच ॥ १० ॥
पदच्छेद
अन्वय
[शाकल्यः आह—] याज्ञवल्क्य, यस्य पृथिवी एव आयतनम्, [यस्य] अग्निः लोकः, [यस्य] मनः ज्योतिः, सर्वस्य आत्मनः परायणम् तम् पुरुषम् यः वै विद्यात्, सः वै वेदिता स्यात् । [याज्ञवल्क्यः आह—] यम् आत्थ, सर्वस्य आत्मनः परायणम् तम् पुरुषम् अहम् वा वेद । यः एव अयम् शारीरः पुरुषः, सः एषः [अस्ति] । शाकल्य, वद एव । [शाकल्यः पप्रच्छ—] तस्य का देवता इति । [याज्ञवल्क्यः] ह उवाच—अमृतम् इति ।
हिन्दी अर्थ
शाकल्य ने कहा: जिसका आश्रय पृथिवी, जिसका लोक अग्नि और जिसकी ज्योति मन है, उस सम्पूर्ण व्यक्ति के परम आश्रय पुरुष को जो जाने, वही ज्ञाता हो, याज्ञवल्क्य। याज्ञवल्क्य ने कहा: तुम जिस सम्पूर्ण व्यक्ति के परम आश्रय पुरुष को कहते हो, उसे मैं जानता हूँ; वह यही शरीर में स्थित पुरुष है। शाकल्य, बताओ, उसकी देवता कौन है? शाकल्य ने कहा: अमृत।
English meaning
Shakalya said, “One who knows the person whose abode is earth, whose world is fire and whose light is mind, the final resort of the whole self, would indeed be a knower, Yajnavalkya.” Yajnavalkya replied, “I know that person, the final resort of the whole self, whom you describe: it is the embodied person. Tell me, Shakalya, what is its deity?” He answered, “The deathless or nectar.”
व्याख्या
शरीर का पृथिवी में आश्रय और अग्नि में प्रकाश-क्षेत्र बताया गया है। अमृत का पद यहाँ बिना अतिरिक्त पहचान के रखा गया है।
Explanation
The embodied person is correlated with earth and fire. Amrita is retained without silently adding an identification not stated in the sentence.
संदर्भ
आठ पुरुषों की परीक्षा में शरीर में स्थित पुरुष का प्रश्न है।
Context
The eight-person examination now concerns the embodied person.