Passage 21.17
रेत एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ । य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एषः । वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति । प्रजापतिरिति होवाच ॥ १७ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[शाकल्यः आह—] याज्ञवल्क्य, यस्य रेतः एव आयतनम्, [यस्य] हृदयम् लोकः, [यस्य] मनः ज्योतिः, सर्वस्य आत्मनः परायणम् तम् पुरुषम् यः वै विद्यात्, सः वै वेदिता स्यात् । [याज्ञवल्क्यः आह—] यम् आत्थ, सर्वस्य आत्मनः परायणम् तम् पुरुषम् अहम् वा वेद । यः एव अयम् पुत्रमयः पुरुषः, सः एषः [अस्ति] । शाकल्य, वद एव । [शाकल्यः पप्रच्छ—] तस्य का देवता इति । [याज्ञवल्क्यः] ह उवाच—प्रजापतिः इति ।
हिन्दी अर्थ
शाकल्य ने कहा: जिसका आश्रय रेतस्, जिसका लोक हृदय और जिसकी ज्योति मन है, उस सम्पूर्ण व्यक्ति के परम आश्रय पुरुष को जो जाने, वही ज्ञाता हो, याज्ञवल्क्य। याज्ञवल्क्य ने कहा: तुम जिस सम्पूर्ण व्यक्ति के परम आश्रय पुरुष को कहते हो, उसे मैं जानता हूँ; वह यही पुत्ररूप पुरुष है। शाकल्य, बताओ, उसकी देवता कौन है? शाकल्य ने कहा: प्रजापति।
English meaning
Shakalya said, “One who knows the person whose abode is semen, whose world is the heart and whose light is mind, the final resort of the whole self, would indeed be a knower, Yajnavalkya.” Yajnavalkya replied, “I know that person, the final resort of the whole self, whom you describe: it is the person embodied in the son. Tell me, Shakalya, what is its deity?” He answered, “Prajapati.”
व्याख्या
पुत्र में व्यक्ति की निरन्तरता इस ऐतिहासिक पितृवंशीय चिन्तन का भाग है। इसे आधुनिक प्रजनन-विज्ञान या पुत्र को पुत्री पर वरीयता देने के निर्देश में न बदलें।
Explanation
Continuity through a son belongs to the passage’s historical patrilineal thought. It is neither modern reproductive science nor advice to prefer sons to daughters.
संदर्भ
आठ पुरुषों की परीक्षा में पुत्ररूप पुरुष का प्रश्न है।
Context
The eight-person examination now concerns the person embodied in the son.