Passage 21.2
स होवाच महिमान एवैषामेते । त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवा इति । कतमे ते त्रयस्त्रिंशदिति । अष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्याः त एकत्रिंशदिन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशाविति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ह उवाच—एते एषाम् महिमानः एव [सन्ति]; तु देवाः त्रयस्त्रिंशत् एव [सन्ति] इति । [शाकल्यः पप्रच्छ—] ते त्रयस्त्रिंशत् कतमे [सन्ति] इति । [याज्ञवल्क्यः आह—] अष्टौ वसवः, एकादश रुद्राः, द्वादश आदित्याः; ते एकत्रिंशत् [सन्ति] । इन्द्रः च एव प्रजापतिः च त्रयस्त्रिंशौ [स्तः] इति ।
हिन्दी अर्थ
याज्ञवल्क्य ने कहा: वे इनके ही महिमारूप विस्तार हैं; देवता वास्तव में तैंतीस हैं। वे तैंतीस कौन हैं? आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य, ये इकतीस हुए; इन्द्र और प्रजापति सहित तैंतीस।
English meaning
Yajnavalkya said, “Those are their manifestations of greatness; the gods are thirty-three.” “Which thirty-three?” “Eight Vasus, eleven Rudras and twelve Adityas make thirty-one; with Indra and Prajapati they are thirty-three.”
व्याख्या
महिमानः अनेक प्रकट शक्तियों का संकेत है। आगे वसु आदि की व्याख्या प्राकृतिक, देहगत और कालगत रूपों से होगी, केवल व्यक्तिनामों की सूची से नहीं।
Explanation
Mahiman points to expanded manifestations. The Vasus and others will be explained through nature, bodily powers and time, rather than solely through personal names.
संदर्भ
बहुत बड़े आह्वान-समूह का तैंतीस मुख्य रूपों से सम्बन्ध बताया जाता है।
Context
The large invocatory group is related to thirty-three principal forms.