Passage 21.25
अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यः । यत्रैतदन्यत्रास्मन्मन्यासै । यद्ध्येतदन्यत्रास्मत्स्याच्छ्वानो वैनदद्युर्वयांसि वैनद्विमथ्नीरन्निति ॥ २५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
याज्ञवल्क्यः ह अहल्लिक इति उवाच—यत्र [यस्मिन् काले] एतत् [हृदयम्] अन्यत्र अस्मत् [शरीरात् त्वम्] मन्यासै [मन्यसे इत्यर्थः], [तदा त्वाम् एवम् सम्बोधयामि] । हि यत् [यदि] एतत् [हृदयम्] अन्यत्र अस्मत् [शरीरात्] स्यात्, [तदा] श्वानः वा एनत् [शरीरम्] अद्युः, वयांसि वा एनत् [शरीरम्] विमथ्नीरन् इति ।
हिन्दी अर्थ
याज्ञवल्क्य ने कहा: अहल्लिक, तुम जो इस हृदय को हमसे कहीं अलग मानते हो! यदि यह हमसे अलग होता, तो कुत्ते इस शरीर को खा जाते या पक्षी इसे नोच डालते।
English meaning
Yajnavalkya said, “Ahallika, to think that this heart could be somewhere apart from us! If it were apart from us, dogs would eat this body or birds would tear it apart.”
व्याख्या
अहल्लिक तीखा संबोधन है; उसका निश्चित आधुनिक अपमानजनक पर्याय आरोपित नहीं किया गया। शरीर और हृदय की परस्पर निर्भरता स्पष्ट करने के लिए निर्जीव देह की छवि प्रयुक्त है।
Explanation
Ahallika is a sharp form of address; no unverified modern insult is imposed on it. The image of a lifeless body illustrates the interdependence of heart and body.
संदर्भ
हृदय को व्यक्ति से अलग स्थान में रखने की कल्पना का प्रत्युत्तर दिया जाता है।
Context
The reply rejects locating the heart apart from the living person.