Passage 25.6
तदेष श्लोको भवति तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिङ्गं मनो यत्र निषक्तमस्य । प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम् । तस्माल्लोकात्पुनरैत्यस्मै लोकाय कर्मणे । इति नु कामयमानः । अथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति । ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ॥ ६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तत् एषः श्लोकः भवति—अस्य लिङ्गम् मनः यत्र निषक्तम् [अस्ति], [अयम्] सक्तः तदेव कर्मणा सह एति । अयम् इह यत् किञ्च करोति, तस्य कर्मणः अन्तम् प्राप्य तस्मात् लोकात् पुनः अस्मै लोकाय कर्मणे एति । इति नु कामयमानः [संसरति] । अथ अकामयमानः—यः अकामः निष्कामः आप्तकामः आत्मकामः [अस्ति], तस्य प्राणाः न उत्क्रामन्ति; [सः] ब्रह्म एव सन् ब्रह्म अप्येति ।
हिन्दी अर्थ
इस विषय में यह श्लोक है: आसक्त व्यक्ति अपने कर्म सहित वहीं जाता है जहाँ उसका लिङ्ग, उसका मन, बँधा है। यहाँ जो भी कर्म करता है, उसके फल के अन्त को पहुँचकर उस लोक से फिर इस लोक में कर्म करने लौटता है। यह हुआ इच्छा करने वाले का हाल। अब जो इच्छा नहीं करता, जो अकाम, निष्काम, जिसकी कामना पूर्ण है और आत्मा ही जिसकी कामना है, उसके प्राण बाहर नहीं निकलते। वह ब्रह्म ही होकर ब्रह्म को प्राप्त होता है।
English meaning
On this there is a verse: attached, a person goes with action to that very place where the mark of individuality, the mind, is fastened. Reaching the end of the results of whatever action was done here, that person returns from that world to this world for action. So it is with one who desires. But one who does not desire, who is without craving, free of desire, fulfilled in desire and whose desire is the Self, has no departure of the vital powers. Being brahman, that one attains brahman.
व्याख्या
लिङ्ग और मन का सम्बन्ध अनुवाद में संकेतित है, पर दार्शनिक सूक्ष्मशरीर-सिद्धान्त अपने-आप नहीं जोड़ा गया। निष्कामता को इच्छाओं का हिंसक दमन नहीं, आत्मसन्तोष के साथ पढ़ना यहाँ अधिक संगत है।
Explanation
The relation of linga and mind is indicated without importing an entire later subtle-body theory. Desirelessness is most coherently read here alongside fulfillment in the Self, not as violent suppression of ordinary needs.
संदर्भ
इच्छा के साथ पुनरागमन और आत्मकाम स्थिति का भेद रखा जाता है।
Context
The passage contrasts desire-driven return with the condition whose desire is the Self.