Passage 25.23
तदेतदृचाभ्युक्तम् एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न कर्मणा वर्धते नो कनीयान् । तस्यैव स्यात्पदवित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेनेति । तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति । सर्वमात्मानं पश्यति । नैनं पाप्मा तरति । सर्वं पाप्मानं तरति । नैनं पाप्मा तपति । सर्वं पाप्मानं तपति । विपापो विरजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवति । एष ब्रह्मलोकः सम्राट् । एनं प्रापितोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः । सोऽहं भगवते विदेहान् ददामि मां चापि सह दास्यायेति ॥ २३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तत् एतत् ऋचा अभ्युक्तम्—एषः ब्राह्मणस्य नित्यः महिमा [अस्ति]; कर्मणा न वर्धते, नो कनीयान् [भवति]; तस्य एव पदवित् स्यात्; तम् विदित्वा पापकेन कर्मणा न लिप्यते इति । तस्मात् एवम्वित् शान्तः दान्तः उपरतः तितिक्षुः समाहितः भूत्वा आत्मनि एव आत्मानम् पश्यति; सर्वम् आत्मानम् पश्यति । पाप्मा एनम् न तरति; [सः] सर्वम् पाप्मानम् तरति । पाप्मा एनम् न तपति; [सः] सर्वम् पाप्मानम् तपति । [सः] विपापः विरजः अविचिकित्सः ब्राह्मणः भवति । सम्राट्, एषः ब्रह्मलोकः [अस्ति]; [त्वम्] एनम् प्रापितः असि इति याज्ञवल्क्यः ह उवाच । सः अहम् भगवते विदेहान् ददामि, माम् च अपि सह दास्याय इति [जनकः उवाच] ।
हिन्दी अर्थ
इसी विषय में ऋचा कहती है: यह ब्राह्मण की नित्य महिमा है; कर्म से न बढ़ती है, न कम होती है। उसी के पद का ज्ञाता बने; उसे जानकर पाप कर्म से लिप्त नहीं होता। इसलिए ऐसा ज्ञाता शान्त, संयत, निवृत्त, सहनशील और एकाग्र होकर आत्मा में ही आत्मा को देखता है; सबको आत्मा के रूप में देखता है। पाप उसे पार नहीं करता, वह सब पाप को पार करता है। पाप उसे जलाता नहीं, वह सब पाप को जला देता है। वह पापरहित, रजोरहित, संशयरहित ब्राह्मण होता है। याज्ञवल्क्य ने कहा: सम्राट्, यही ब्रह्मलोक है; तुम्हें इसमें पहुँचा दिया गया है। जनक बोले: मैं भगवान् को विदेह देश देता हूँ और सेवा के लिए अपने को भी उसके साथ देता हूँ।
English meaning
A verse declares this: this is the brahmana’s enduring greatness; action neither enlarges nor diminishes it. One should know its station; knowing it, one is not stained by evil action. Therefore one who knows in this way, becoming tranquil, restrained, withdrawn, patient and collected, sees the Self in the Self and sees everything as the Self. Evil does not overcome that one; that one overcomes all evil. Evil does not burn that one; that one burns away all evil. Such a brahmana is free of evil, stain and uncertainty. Yajnavalkya said, “Your Majesty, this is the world of brahman. You have been brought to it.” Janaka replied, “I give the revered teacher Videha, and myself together with it for service.”
व्याख्या
पाँच साधक-गुण और पाप के साथ दोनों उलटे सम्बन्ध पूरे रखे गए हैं। पाप से अलिप्तता नैतिक जवाबदेही से छूट नहीं है। राज्य और अपने को देने का कथन ऐतिहासिक गुरु-राजा संवाद है, आज किसी व्यक्ति या समुदाय को अधिकाररहित करने का समर्थन नहीं।
Explanation
All five disciplines and both reversed relations to evil are retained. Non-staining is not exemption from ethical responsibility. The gift of kingdom and self belongs to the historical teacher-king narrative, not a present endorsement of removing anyone’s rights.
संदर्भ
जनक को मुक्ति का उत्तर मिलने पर संवाद का राजकीय समर्पण आता है।
Context
The answer to Janaka’s liberation question culminates in the king’s declaration of service.