Passage 25.22
स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु । य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते । सर्वस्य वशी । सर्वस्येशानः । सर्वस्याधिपतिः । स न साधुना कर्मणा भूयान् । नो एवासाधुना कनीयान् । एष सर्वेश्वरः । एष भूताधिपतिः । एष भूतपालः । एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय । तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन । एतमेव विदित्वा मुनिर्भवति । एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते । किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोक इति । ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति । या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः । स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यति । एतमु हैवैते न तरत इत्यतः पापमकरवमित्यतः कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते तरति नैनं कृताकृते तपतः । ॥ २२ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यः अयम् प्राणेषु विज्ञानमयः [अस्ति], सः वा एषः महान् अजः आत्मा [अस्ति] । यः एषः अन्तर्हृदये आकाशः [अस्ति], तस्मिन् [सः] शेते । [सः] सर्वस्य वशी, सर्वस्य ईशानः, सर्वस्य अधिपतिः [अस्ति] । सः साधुना कर्मणा भूयान् न [भवति], नो एव असाधुना [कर्मणा] कनीयान् [भवति] । एषः सर्वेश्वरः [अस्ति], एषः भूताधिपतिः [अस्ति], एषः भूतपालः [अस्ति]; एषः एषाम् लोकानाम् असम्भेदाय विधरणः सेतुः [अस्ति] । ब्राह्मणाः तम् एतम् वेदानुवचनेन यज्ञेन दानेन अनाशकेन तपसा विविदिषन्ति । एतम् एव विदित्वा [सः] मुनिः भवति । प्रव्राजिनः एतम् एव लोकम् इच्छन्तः प्रव्रजन्ति । एतत् ह स्म वै तत् [पारिव्राज्यकारणम्]—पूर्वे विद्वांसः प्रजाम् न कामयन्ते; येषाम् नः अयम् आत्मा अयम् लोकः [अस्ति], [ते वयम्] प्रजया किम् करिष्यामः इति । ते ह स्म पुत्रैषणायाः च वित्तैषणायाः च लोकैषणायाः च व्युत्थाय अथ भिक्षाचर्यम् चरन्ति । या हि एव पुत्रैषणा, सा वित्तैषणा [अस्ति]; या वित्तैषणा, सा लोकैषणा [अस्ति]; एते उभे हि एषणे एव भवतः । सः एषः न इति न इति आत्मा [अस्ति]; अगृह्यः [अस्ति], हि न गृह्यते; अशीर्यः [अस्ति], हि न शीर्यते; असङ्गः [अस्ति], हि न सज्यते; असितः [अस्ति], न व्यथते, न रिष्यति । एते एतम् उ ह एव न तरतः इति—अतः पापम् अकरवम् इति, अतः कल्याणम् अकरवम् इति [एते चिन्ते] । एषः उ ह एव एते उभे तरति; कृताकृते एनम् न तपतः ।
हिन्दी अर्थ
यह वही महान्, अज आत्मा है जो प्राणों में विज्ञानमय है। हृदय के भीतर जो आकाश है, उसमें वह स्थित है। वह सबका नियन्ता, सबका ईशान और सबका अधिपति है। अच्छे कर्म से वह अधिक नहीं होता और बुरे कर्म से कम नहीं होता। वह सर्वेश्वर, प्राणियों का अधिपति और प्राणियों का रक्षक है। वह इन लोकों को आपस में मिलकर नष्ट होने से रोकने वाला सेतु और धारणकर्ता है। ब्राह्मण वेद-अध्ययन, यज्ञ, दान और कामना के संयम वाले अनाशक तप द्वारा उसे जानना चाहते हैं। उसे जानकर ही मुनि होता है। उसी को अपना लोक चाहने वाले प्रव्राजक प्रव्रज्या लेते हैं। पूर्वकाल के ज्ञानी सन्तान की इच्छा नहीं करते थे। वे कहते थे: जिनके लिए यह आत्मा ही अपना लोक है, वे हम सन्तान से क्या सिद्ध करेंगे? वे पुत्र की इच्छा, धन की इच्छा और लोक की इच्छा से उठकर भिक्षाचर्या करते थे। जो पुत्र की इच्छा है वही धन की इच्छा है; जो धन की इच्छा है वही लोक की इच्छा है। ये दोनों एषणाएँ ही हैं। वह आत्मा नेति नेति है: अगृह्य, क्योंकि पकड़ा नहीं जाता; अशीर्य, क्योंकि क्षीण नहीं होता; असंग, क्योंकि चिपकता नहीं; अबद्ध, न व्यथित होता है, न हानि पाता है। ये दोनों विचार उस ज्ञाता को नहीं घेरते: इस कारण मैंने पाप किया, इस कारण मैंने शुभ कर्म किया। वह इन दोनों को पार कर जाता है। किया हुआ और न किया हुआ उसे सन्तप्त नहीं करते।
English meaning
This is the great, unborn Self, the conscious reality among the vital powers. It rests in the space within the heart. It governs all, rules all and presides over all. Good action does not make it greater, nor bad action smaller. It is the lord of all, ruler of beings and guardian of beings. It is the bridge and supporting boundary that prevents these worlds from collapsing together. Brahmanas seek to know it through Vedic study, sacrifice, giving and ascetic restraint, understood here as restraint of craving. Knowing it, one becomes a sage. Wanderers go forth seeking this very Self as their world. Earlier knowers did not desire offspring. They asked, “What would we accomplish through offspring, we whose Self is itself our world?” Rising beyond the pursuit of sons, wealth and worlds, they lived by mendicancy. The pursuit of sons is the pursuit of wealth; the pursuit of wealth is the pursuit of worlds. Both are pursuits. That Self is “not this, not this”: ungraspable, for it cannot be grasped; undecaying, for it does not decay; unattached, for it does not cling; unfettered, neither distressed nor injured. These two reflections do not overtake the knower: “For this reason I did evil” and “For this reason I did good.” The knower crosses beyond both. What has been done and what has been left undone do not torment that one.
व्याख्या
मूल चयन में छूटा आगे का अंश दूसरे, स्पष्ट रूप से श्रेयांकित मुक्त-अनुज्ञप्ति स्रोत से जोड़ा गया है और अनुवाद में पूरा उपस्थित है। पुत्र, धन और लोक की तीन इच्छाओं को परस्पर सम्बद्ध बताकर पाठ उन्हें दोनों एषणाएँ कहता है; यह संख्या ज्यों की त्यों रखी गई है। अनाशक को प्राचीन भाष्य कामना के उपवास के रूप में समझाता है, भोजन सर्वथा छोड़ना नहीं। संन्यास और सन्तान की अनिच्छा ऐतिहासिक साधक-आदर्श हैं, सबके लिए परिवार छोड़ने की सलाह नहीं; कर्म से अतीतता भी नैतिक जवाबदेही का निषेध नहीं।
Explanation
The continuation missing from the original selection has been added from a separately credited freely licensed source and is fully represented in the translation. After connecting the three pursuits of sons, wealth and worlds, the text calls them “both pursuits”; that wording is retained. The ancient commentary reads anashaka as abstaining from craving, not abandoning food altogether. Renunciation and not desiring offspring are historical ascetic ideals, not advice that everyone should leave family life; transcending action is not exemption from ethical responsibility.
संदर्भ
आत्मा की स्वतंत्रता से प्रव्रज्या, तीन एषणाओं से निवृत्ति और नेति-नेति का सम्बन्ध जोड़ा जाता है।
Context
The Self’s independence is connected with renunciation, withdrawal from three pursuits and “not this, not this.”