Passage 5.3
त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुत । अन्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषमिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति । कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाश्रद्धा धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव । तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजानाति । यः कश्च शब्दो वागेव सा । एषा ह्यन्तं आयत्तैषा हि न । प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानोऽन इत्येतत्सर्वं प्राण एव । एतन्मयो वा अयमात्मा । वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
त्रीणि आत्मने अकुरुत इति; मनः वाचम् प्राणम् [इति] तानि आत्मने अकुरुत । अन्यत्रमनाः अभूवम्, न अदर्शम्; अन्यत्रमनाः अभूवम्, न अश्रौषम् इति । हि मनसा एव पश्यति, मनसा शृणोति । कामः संकल्पः विचिकित्सा श्रद्धा अश्रद्धा धृतिः अधृतिः ह्रीः धीः भीः इति एतत् सर्वम् मनः एव [अस्ति] । तस्मात् पृष्ठतः उपस्पृष्टः अपि मनसा विजानाति । यः कश्च शब्दः [अस्ति], सा वाक् एव [अस्ति] । हि एषा अन्तम् [अभिधेयावसानम्] आयत्ता [अस्ति]; हि एषा न [प्रकाश्या अस्ति] । प्राणः अपानः व्यानः उदानः समानः अनः इति एतत् सर्वम् प्राणः एव [अस्ति] । अयम् आत्मा [कार्यकरणसङ्घातः] वा एतन्मयः वाङ्मयः मनोमयः प्राणमयः [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
“तीन अपने लिए बनाए”: उसने मन, वाणी और प्राण अपने लिए बनाए। लोग कहते हैं, मेरा मन कहीं और था, इसलिए मैंने नहीं देखा; मन कहीं और था, इसलिए मैंने नहीं सुना। मन से ही देखते और मन से सुनते हैं। कामना, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति, अधृति, लज्जा, बुद्धि और भय, ये सब मन ही हैं। इसलिए पीठ की ओर स्पर्श होने पर भी मन से पहचाना जाता है। कोई भी शब्द हो, वह वाणी ही है। वही अर्थ के निर्धारण तक पहुँचाती है; वह स्वयं उस तरह प्रकाशित किए जाने वाली नहीं है। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान और अन, ये सब प्राण ही हैं। यह व्यक्त आत्मरूप इन्हीं का बना है: वाणीमय, मनोमय और प्राणमय।
English meaning
“Three he made for himself”: he made mind, speech and breath for himself. People say, “My mind was elsewhere, so I did not see,” or “My mind was elsewhere, so I did not hear.” One sees with the mind and hears with the mind. Desire, resolve, doubt, trust, distrust, steadiness, unsteadiness, shame, understanding and fear are all mind. Hence even when touched from behind one recognizes the touch through mind. Whatever sound there is belongs to speech. Speech brings one to the determination of meaning; it is not itself illuminated in that same way. Prana, apana, vyana, udana, samana and ana are all vital power. This embodied self is made of these: speech, mind and breath.
व्याख्या
ध्यान का कहीं और होना देखने-सुनने में मन की भागीदारी का अनुभवजन्य उदाहरण है। वाणी वाला संक्षिप्त वाक्य अत्यन्त संकेतात्मक है; अर्थनिर्धारण और स्वयं न प्रकाशित होने की व्याख्या प्राचीन भाष्य का सहारा लेकर दी गई है। प्राण के नामों को आधुनिक शरीर-विज्ञान की समानार्थी सूची नहीं बनाया गया।
Explanation
Having one’s attention elsewhere illustrates mind’s participation in seeing and hearing. The sentence about speech is exceptionally elliptical; the interpretation concerning determination of meaning and not being separately illuminated is informed by the ancient commentary. The names of vital functions are not equated with a list of modern physiological processes.
संदर्भ
अब शेष तीन अन्न मन, वाणी और प्राण के रूप में स्पष्ट किए जाते हैं।
Context
The remaining three foods are now identified as mind, speech and vital power.