Passage 5.20
अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति । स वै दैवः प्राणो यः संचरंश्चासंचरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति । स एष एवंवित्सर्वेषां भूतानामात्मा भवति । यथैषा देवतैवं सः । यथैतां देवतां सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतान्यवन्ति । यदु किञ्चेमाः प्रजाः शोचन्त्यमैवासां तद्भवति । पुण्यमेवामुं गच्छति । न ह वै देवान् पापं गच्छति ॥ २० ॥
पदच्छेद
अन्वय
अद्भ्यः च चन्द्रमसः च दैवः प्राणः एनम् आविशति । यः संचरन् च असंचरन् च न व्यथते, अथो न रिष्यति, सः वै दैवः प्राणः [अस्ति] । सः एषः एवम्वित् सर्वेषाम् भूतानाम् आत्मा भवति । यथा एषा देवता [अस्ति], एवम् सः [अस्ति] । यथा सर्वाणि भूतानि एताम् देवताम् अवन्ति, एवम् ह सर्वाणि भूतानि एवम्विदम् अवन्ति । इमाः प्रजाः यत् उ किञ्च शोचन्ति, तत् आसाम् अमा एव भवति । पुण्यम् एव अमुम् गच्छति; पापम् ह वै देवान् न गच्छति ।
हिन्दी अर्थ
जल और चन्द्रमा से दिव्य प्राण उसमें प्रवेश करता है। यह दिव्य प्राण चलते और स्थिर रहते हुए भी व्यथित या आहत नहीं होता। ऐसा जानने वाला सभी प्राणियों का आत्मा होता है; जैसे यह देवता है, वैसा ही वह। जैसे सब प्राणी इस देवता को सँभालते हैं, वैसे ही इस ज्ञाता को सँभालते हैं। इन प्रजाओं को जो शोक होता है, वह उनके अपने पास ही रहता है; उसके पास पुण्य ही पहुँचता है। देवताओं तक पाप नहीं पहुँचता, ऐसा पाठ कहता है।
English meaning
Divine vital power enters him from the waters and the moon. This divine power, whether moving or still, is neither distressed nor injured. One who knows this becomes the self of all beings: as this deity is, so is that person. As all beings sustain the deity, so they sustain such a knower. Whatever grief these creatures experience remains with them; only merit reaches that person. The text says that evil does not reach the gods.
व्याख्या
ज्ञाता को देवतारूप मानकर दुःख और पाप से असंग कहा गया है। यह उस धार्मिक स्थिति का कथन है, दूसरों के दुःख के प्रति उपेक्षा या अपने कर्मों की जिम्मेदारी से छूट नहीं। अमा का अर्थ यहाँ अपने घर या अपने पास है।
Explanation
The knower, identified with the deity, is described as untouched by sorrow and evil. This states a religious condition, not indifference to others’ suffering or exemption from responsibility for one’s actions. Ama here means at home or with oneself.
संदर्भ
दिव्य वाणी और मन के बाद दिव्य प्राण का प्रवेश त्रयी को पूरा करता है।
Context
The entry of divine vital power completes the triad after speech and mind.