Passage 5.21
अथातो व्रतमीमांसा । प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे । तानि सृष्टान्यन्योऽन्येनास्पर्धन्त । वदिष्याम्येवाहमिति वाग्दध्रे । द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः । श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रम् । एवमन्यानि कर्माणि यथाकर्मम् । तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे । तान्याप्नोत् । तान्याप्त्वा मृत्युरवारुन्ध । तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक् । श्राम्यति चक्षुः । श्राम्यति श्रोत्रम् । अथेममेव नाप्नोत्योऽयं मध्यमः प्राणः । तानि ज्ञातुं दध्रिरे । अयं वै नः श्रेष्ठो यः संचरंश्चासंचरंश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति । हन्तास्यैव सर्वे रूपं भवामेति । त एतस्यैव सर्वे रूपमभवन् । तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा इति । तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन् कुले भवति य एवं वेद । य उ हैवंविदा स्पर्धतेऽनुशुष्यति । अनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् ॥ २१ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ अतः व्रतमीमांसा [प्रवर्तते] । प्रजापतिः ह कर्माणि ससृजे । सृष्टानि तानि अन्योन्येन अस्पर्धन्त । अहम् वदिष्यामि एव इति वाक् दध्रे । अहम् द्रक्ष्यामि इति चक्षुः [दध्रे]; अहम् श्रोष्यामि इति श्रोत्रम् [दध्रे] । एवम् अन्यानि कर्माणि यथाकर्मम् [दध्रिरे] । मृत्युः श्रमः भूत्वा तानि उपयेमे; तानि आप्नोत् । मृत्युः तानि आप्त्वा अवारुन्ध । तस्मात् वाक् श्राम्यति एव; चक्षुः श्राम्यति; श्रोत्रम् श्राम्यति । अथ यः अयम् मध्यमः प्राणः [अस्ति], इमम् एव न आप्नोति । तानि ज्ञातुम् दध्रिरे-अयम् वै नः श्रेष्ठः [अस्ति], यः संचरन् च असंचरन् च न व्यथते, अथो न रिष्यति । हन्त, [वयम्] सर्वे अस्य एव रूपम् भवाम इति । ते एतस्य एव सर्वे रूपम् अभवन् । तस्मात् एते एतेन प्राणाः इति आख्यायन्ते । यः एवम् वेद [सः] यस्मिन् कुले भवति, तत् कुलम् तेन ह वाव आचक्षते । यः उ ह एवम्विदा स्पर्धते, [सः] अनुशुष्यति; ह अनुशुष्य एव अन्ततः म्रियते इति अध्यात्मम् ।
हिन्दी अर्थ
अब व्रत का विचार है। प्रजापति ने क्रियाशक्तियाँ उत्पन्न कीं। उत्पन्न होकर वे आपस में स्पर्धा करने लगीं। वाणी ने ठाना: मैं बोलती ही रहूँगी; चक्षु ने: मैं देखता रहूँगा; श्रोत्र ने: मैं सुनता रहूँगा। अन्य शक्तियों ने भी अपने-अपने कार्य के अनुसार ऐसा ही ठाना। मृत्यु श्रम बनकर उनके पास आई, उन्हें पकड़ लिया और वश में कर लिया। इसलिए वाणी थकती है, चक्षु थकता है, श्रोत्र थकता है। लेकिन इस मध्यस्थ प्राण को वह नहीं पकड़ पाई। उन्होंने जाना: यही हममें श्रेष्ठ है, जो चलते और स्थिर रहते हुए भी व्यथित या आहत नहीं होता। आओ, हम सब इसी का रूप हों। वे सब इसी का रूप हुए; इसीलिए सब इसी नाम से प्राण कहलाते हैं। जिस कुल में ऐसा ज्ञाता होता है, उस कुल को उसी के नाम से कहते हैं। जो उससे स्पर्धा करता है, वह सूखता है और अन्त में सूखकर मरता है, ऐसा पाठ कहता है। यह शरीर-संबन्धी विचार है।
English meaning
Now comes an inquiry into a vow. Prajapati created the powers of action, and they competed with one another. Speech resolved, “I will go on speaking”; sight, “I will go on seeing”; hearing, “I will go on hearing.” The other powers likewise resolved according to their own functions. Death approached them as fatigue, seized them and held them in its power. Therefore speech tires, sight tires and hearing tires. But it did not seize the central vital power. The powers recognized, “This is the best of us, moving or still without distress or injury. Let us all take its form.” They all became its form, and are therefore called pranas after it. A family containing such a knower is named after that person. The text says that one who competes with such a knower withers and ultimately dies of withering. This is the account relating to the individual body.
व्याख्या
इन्द्रिय-क्रियाओं का थकना और प्राण का निरन्तर बने रहना कथा के भीतर अंतर है। इसे निरन्तर अभ्यास करके नींद या विश्राम की आवश्यकता मिटाने की शिक्षा नहीं समझें। विरोधी के सूखने का कथन भी प्राचीन फलश्रुति है, चिकित्सकीय भविष्यवाणी नहीं।
Explanation
The contrast is between tiring sensory activities and continuing vital power within the story. It is not instruction to eliminate the need for sleep or rest through continuous practice. The rival’s withering is an ancient reward-claim, not a medical prediction.
संदर्भ
अब कौन-सी क्रिया अविराम व्रत का आधार हो सकती है, यह एक नई स्पर्धा-कथा से परखा जाता है।
Context
A new contest tests which activity can serve as the basis of an enduring vow.