Passage 5.12
अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरम् । ज्योतीरूपमसावादित्यः । तद्यावदेव मनस्तावती द्यौस्तावानसावादित्यः । तौ मिथुनं समैताम् । ततः प्राणोऽजायत । स इन्द्रः । स एषोऽसपत्नः । द्वितीयो वै सपत्नः । नास्य सपत्नो भवति य एवं वेद ॥ १२ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ एतस्य मनसः द्यौः शरीरम् [अस्ति]; असौ आदित्यः ज्योतीरूपम् [अस्ति] । तत् यावत् एव मनः [अस्ति], तावती द्यौः [अस्ति], तावान् असौ आदित्यः [अस्ति] । तौ मिथुनम् समैताम् । ततः प्राणः अजायत । सः इन्द्रः [अस्ति]; सः एषः असपत्नः [अस्ति] । द्वितीयः वै सपत्नः [अस्ति] । यः एवम् वेद, अस्य सपत्नः न भवति ।
हिन्दी अर्थ
उस मन का शरीर द्युलोक है और ज्योतिरूप वह सूर्य। जितना व्यापक मन है, उतना द्युलोक और उतना सूर्य। वे दोनों युग्म रूप में मिले; उनसे प्राण उत्पन्न हुआ। वही इन्द्र है, प्रतिद्वन्द्वी-रहित। दूसरा ही प्रतिद्वन्द्वी होता है। जो ऐसा जानता है, उसका प्रतिद्वन्द्वी नहीं होता।
English meaning
Heaven is the body of mind, and the sun its luminous form. As extensive as mind is, so extensive are heaven and the sun. The two joined as a pair, and from them arose vital power. That is Indra, without a rival. A second is what constitutes a rival. One who knows this has no rival.
व्याख्या
दोनों का संकेत वाणी-मन के दैवी रूपों की ओर है। इन्द्र का प्रतिद्वन्द्वी-रहित होना इस उपासना में प्राण की प्रमुखता बताता है। फलश्रुति को सांसारिक प्रतिस्पर्धा में विजय की गारंटी नहीं माना गया।
Explanation
The pair refers to the divine forms of speech and mind. Indra’s freedom from a rival expresses vital power’s precedence in this contemplation. The promised benefit is not treated as a guarantee of victory in ordinary competition.
संदर्भ
वाणी के पृथिवी-अग्नि रूप के बाद मन का द्युलोक-सूर्य रूप बताया जाता है और दोनों का मेल प्राण की उत्पत्ति समझाता है।
Context
After speech as earth and fire, mind appears as heaven and sun; their pairing explains the emergence of vital power.