Passage 5.22
अथाधिदेवतं ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे । तप्स्याम्यहमित्यादित्यः । भास्याम्यहमिति चन्द्रमाः । एवमन्या देवता यथादेवतम् । स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण एवमेतासां देवतानां वायुः । म्लोचन्ति ह्यन्या देवता न वायुः । सैषानस्तमिता देवता यद्वायुः ॥ २२ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ अधिदेवतम् [उच्यते] । अहम् ज्वलिष्यामि एव इति अग्निः दध्रे । अहम् तप्स्यामि इति आदित्यः [दध्रे]; अहम् भास्यामि इति चन्द्रमाः [दध्रे] । एवम् अन्याः देवताः यथादेवतम् [दध्रिरे] । यथा सः एषाम् प्राणानाम् मध्यमः प्राणः [अस्ति], एवम् एतासाम् देवतानाम् वायुः [अस्ति] । हि अन्याः देवताः म्लोचन्ति, वायुः न [म्लोचति] । यत् वायुः [अस्ति], सा एषा अनस्तमिता देवता [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
अब देवताओं के सम्बन्ध में: अग्नि ने ठाना कि मैं जलता ही रहूँगा; सूर्य ने कि मैं तपता रहूँगा; चन्द्रमा ने कि मैं चमकता रहूँगा। अन्य देवताओं ने भी अपने-अपने कार्य के अनुसार ऐसा किया। इन प्राणों में जैसे मध्यस्थ प्राण है, वैसे ही इन देवताओं में वायु है। दूसरे देवता अस्त होते हैं, वायु नहीं। वायु ही वह देवता है जो अस्त नहीं होता।
English meaning
Now in relation to the deities: fire resolved, “I will go on burning”; the sun, “I will go on giving heat”; the moon, “I will go on shining.” The other deities did likewise according to their own functions. What the central vital power is among the faculties, wind is among these deities. The others set, but wind does not. Wind is the deity that does not set.
व्याख्या
अध्यात्म और अधिदेवत के समानान्तर स्तर इस पाठ की संरचना हैं। सूर्य और चन्द्रमा का दृश्य रूप से अस्त होना वायु की अपेक्षाकृत अनवरत गति के विपरीत रखा गया है; यह आधुनिक खगोलशास्त्र का प्रतिपादन नहीं।
Explanation
The individual and divine levels are parallel parts of the text’s structure. The visible setting of sun and moon contrasts with wind’s comparatively continuing movement; this is not a statement of modern astronomy.
संदर्भ
शरीर में प्राण का स्थान अब देवताओं में वायु के रूप में दोहराया जाता है।
Context
The place of vital power in the body is now repeated as the place of wind among the deities.