Passage 7.20
स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथा अग्नेः क्षुद्रा विष्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति । तस्योपनिषत्सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ २० ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यथा ऊर्णनाभिः तन्तुना उच्चरेत्, यथा अग्नेः क्षुद्राः विष्फुलिङ्गाः व्युच्चरन्ति, एवम् एव अस्मात् आत्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति । तस्य उपनिषत् सत्यस्य सत्यम् इति [अस्ति] । प्राणाः वै सत्यम् [सन्ति]; एषः तेषाम् सत्यम् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
जैसे मकड़ी अपने तन्तु के सहारे बाहर निकलती है और जैसे अग्नि से छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस आत्मा से सभी प्राण, सभी लोक, सभी देवता और सभी प्राणी निकलते हैं। इसका गूढ़ नाम “सत्य का सत्य” है। प्राण सत्य हैं और यह उनका सत्य है।
English meaning
As a spider comes forth along its thread, and as tiny sparks fly out from a fire, so all vital faculties, all worlds, all gods and all beings issue from this Self. Its hidden designation is “the truth of truth.” The vital faculties are truth, and this is their truth.
व्याख्या
मकड़ी और चिनगारी की उपमाएँ उत्पत्ति के साथ अपने आधार पर निर्भरता दिखाती हैं। प्राणों को असत्य नहीं कहा गया; आत्मा को उनके सत्य का आधार बताया गया है। उपनिषत् यहाँ किसी पुस्तक का नाम नहीं, गूढ़ पहचान है।
Explanation
The spider and sparks illustrate emergence together with dependence on a source. The vital faculties are not dismissed as false; the Self is called the foundation of their truth. Upanishad here means a hidden identification, not the title of a book.
संदर्भ
पहला ब्राह्मण निद्रा के अनुभव से आगे बढ़कर आत्मा को समस्त जीवन और जगत का मूल बताकर समाप्त होता है।
Context
The first brahmana concludes by moving from sleep to the Self as the source of life and the worlds.