Passage 7.5
स होवाच गार्ग्यः य एवायमाकाशे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः । पूर्णमप्रवर्तीति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिर्नास्यास्माल्लोकात्प्रजोद्वर्तते ॥ ५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ह गार्ग्यः उवाच-यः एव अयम् आकाशे पुरुषः [अस्ति], एतम् एव अहम् ब्रह्म उपासे इति । सः ह अजातशत्रुः उवाच-मा मा एतस्मिन् संवदिष्ठाः । पूर्णम् अप्रवर्ति इति वा अहम् एतम् उपासे इति । सः यः एतम् एवम् उपास्ते, [सः] प्रजया पशुभिः पूर्यते; अस्य प्रजा अस्मात् लोकात् न उद्वर्तते ।
हिन्दी अर्थ
गार्ग्य ने कहा: मैं आकाश में स्थित इस पुरुष की ही ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ। अजातशत्रु ने कहा: इस विषय में मुझसे बात मत बढ़ाइए; मैं इसकी उपासना पूर्ण और अविचल के रूप में करता हूँ। जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह सन्तति और पशुओं से सम्पन्न होता है; उसकी सन्तति इस लोक से उखड़ती नहीं।
English meaning
Gargya said, “I meditate on this person in space as Brahman.” Ajatashatru replied, “Do not pursue this account with me; I meditate on it as full and unmoving.” Whoever meditates on it in this way receives this result: That person is filled with offspring and livestock; that person’s line is not uprooted from this world.
व्याख्या
आकाश की पूर्णता और स्थिरता को परिवार की निरन्तरता तथा पशुधन की सम्पन्नता से जोड़ा गया है। अप्रवर्ति का अर्थ यहाँ अविचल लिया गया है; इसे ब्रह्म की अंतिम परिभाषा नहीं माना गया।
Explanation
The fullness and stability of space are related to continuity of descendants and abundance of livestock. Apravarti is understood here as unmoving, not as a final definition of Brahman.
संदर्भ
अब दृश्य प्रकाश से आगे आकाश के पुरुष का प्रस्ताव आता है।
Context
The discussion moves beyond visible lights to the person in space.