Passage 7.18
स यत्रैतत्स्वप्न्यया चरति ते हास्य लोकाः । तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मणः । उतेवोच्चावचं निगच्छति । स यथा महाराजो जानपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥ १८ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः यत्र एतत् स्वप्न्यया [स्वप्नवृत्त्या] चरति, ते ह अस्य लोकाः [सन्ति] । तत् उत [सः] महाराजः इव भवति, उत [सः] महाब्राह्मणः इव [भवति], उत [सः] उच्चावचम् इव निगच्छति । सः यथा महाराजः जानपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामम् परिवर्तेत, एवम् एव एषः एतत् प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामम् परिवर्तते ।
हिन्दी अर्थ
जब वह स्वप्न की अवस्था में विचरता है, तो वे उसके अपने लोक होते हैं। वहाँ वह मानो महाराजा होता है, मानो महान् ब्राह्मण होता है, और मानो ऊँची-नीची स्थितियों में पहुँचता है। जैसे महाराजा अपने जनपद के लोगों को साथ लेकर अपने राज्य में इच्छानुसार घूमे, वैसे ही यह पुरुष प्राणों को साथ लेकर अपने शरीर में इच्छानुसार विचरता है।
English meaning
When he moves about in dream, those are his own worlds. There he becomes, as it were, a great king, or a great Brahmin, or passes through high and low conditions. As a great king might take the people of his realm with him and move through his own domain as he wishes, so this person takes the vital faculties and moves as he wishes within his own body.
व्याख्या
इव की पुनरावृत्ति बताती है कि राजा या ब्राह्मण बनना स्वप्न का अनुभव है, बाहरी पद-प्राप्ति नहीं। अपने जनपद में विचरता राजा स्वप्न-जगत में अनुभवकर्ता और उसकी इन्द्रिय-शक्तियों की उपमा है।
Explanation
The repeated “as it were” marks kingship and Brahmin status as dream experiences, not actual changes of social position. A king moving in his own realm illustrates the experiencer’s relation to the faculties in a dream world.
संदर्भ
निद्रा की सामान्य चर्चा से अब स्वप्न के आन्तरिक अनुभवों की ओर बढ़ा जाता है।
Context
The account moves from sleep in general to the inward experiences of dreaming.