Passage 7.6
स होवाच गार्ग्यः य एवायं वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः । इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते जिष्णुर्हापराजिष्णुर्भवत्यन्यतस्त्यजायी ॥ ६ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ह गार्ग्यः उवाच-यः एव अयम् वायौ पुरुषः [अस्ति], एतम् एव अहम् ब्रह्म उपासे इति । सः ह अजातशत्रुः उवाच-मा मा एतस्मिन् संवदिष्ठाः । इन्द्रः वैकुण्ठः अपराजिता सेना इति वा अहम् एतम् उपासे इति । सः यः एतम् एवम् उपास्ते, [सः] ह जिष्णुः अपराजिष्णुः अन्यतस्त्यजायी भवति ।
हिन्दी अर्थ
गार्ग्य ने कहा: मैं वायु में स्थित इस पुरुष की ही ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ। अजातशत्रु ने कहा: इस विषय में मुझसे बात मत बढ़ाइए; मैं इसकी उपासना वैकुण्ठ इन्द्र, अपराजित सेना के रूप में करता हूँ। जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह विजयी और अपराजित होता है, दूसरे पक्षों को जीतने वाला होता है।
English meaning
Gargya said, “I meditate on this person in the wind as Brahman.” Ajatashatru replied, “Do not pursue this account with me; I meditate on it as Indra Vaikuntha, the unconquered army.” Whoever meditates on it in this way receives this result: That person becomes victorious and undefeated, a conqueror of opposing sides.
व्याख्या
वायु की शक्ति का वर्णन विजय और अपराजेय सेना की भाषा में होता है। वैकुण्ठ यहाँ इन्द्र का विशेषण या उपनाम है; इसे बिना आधार विष्णु के वैकुण्ठलोक का उल्लेख नहीं बनाया गया।
Explanation
Wind’s power is expressed in the language of victory and an unconquered army. Vaikuntha is here an epithet or designation of Indra; it is not silently turned into a reference to Vishnu’s heavenly abode.
संदर्भ
वायु के पुरुष पर बालाकि और राजा का अगला आदान-प्रदान है।
Context
The next exchange concerns the person in wind.