Passage 7.13
स होवाच गार्ग्यः य एवायमात्मनि पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः । आत्मन्वीति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्त आत्मन्वी ह भवति । आत्मन्विनी हास्य प्रजा भवति । स ह तूष्णीमास गार्ग्यः ॥ १३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ह गार्ग्यः उवाच-यः एव अयम् आत्मनि पुरुषः [अस्ति], एतम् एव अहम् ब्रह्म उपासे इति । सः ह अजातशत्रुः उवाच-मा मा एतस्मिन् संवदिष्ठाः । आत्मन्वी इति वा अहम् एतम् उपासे इति । सः यः एतम् एवम् उपास्ते, [सः] ह आत्मन्वी भवति; अस्य प्रजा ह आत्मन्विनी भवति । सः गार्ग्यः ह तूष्णीम् आस ।
हिन्दी अर्थ
गार्ग्य ने कहा: मैं इस देह के भीतर स्थित पुरुष की ही ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ। अजातशत्रु ने कहा: इस विषय में मुझसे बात मत बढ़ाइए; मैं इसकी उपासना आत्मवान् के रूप में करता हूँ। जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह आत्मवान् होता है और उसकी सन्तति आत्मवती होती है। तब गार्ग्य चुप हो गए।
English meaning
Gargya said, “I meditate on this person within oneself as Brahman.” Ajatashatru replied, “Do not pursue this account with me; I meditate on it as one possessed of a self.” Whoever meditates on it in this way receives this result: That person becomes possessed of a self, and that person’s offspring likewise possesses a self. Gargya then fell silent.
व्याख्या
आत्मनि यहाँ व्यक्तिगत देह या अपने भीतर का क्षेत्र है; आत्मन्वी अपनी सत्ता या आत्मबल से सम्पन्न होने का भाव देता है। इस विशेष ध्यान को पूरे आत्मतत्त्व का ज्ञान मान लेने की सीमा राजा अगले अनुच्छेद में बताएँगे।
Explanation
Atmani here locates the person within the individual or embodied self; atmanvin suggests possession of selfhood or self-possession. The next passage distinguishes this particular contemplation from full knowledge of the Self.
संदर्भ
बालाकि का अंतिम प्रस्ताव भीतर स्थित पुरुष है; इसके बाद उनके उत्तर समाप्त होते हैं।
Context
Balaki’s final proposal is the person within oneself; after this his answers run out.