Passage 7.9
स होवाच गार्ग्यः य एवायमादर्शे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः । रोचिष्णुरिति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते रोचिष्णुर्ह भवति । रोचिष्णुर्हास्य प्रजा भवति । अथो यैः संनिगच्छति । सर्वांस्तानतिरोचते ॥ ९ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ह गार्ग्यः उवाच-यः एव अयम् आदर्शे पुरुषः [अस्ति], एतम् एव अहम् ब्रह्म उपासे इति । सः ह अजातशत्रुः उवाच-मा मा एतस्मिन् संवदिष्ठाः । रोचिष्णुः इति वा अहम् एतम् उपासे इति । सः यः एतम् एवम् उपास्ते, [सः] ह रोचिष्णुः भवति; अस्य प्रजा ह रोचिष्णुः भवति । अथो यैः संनिगच्छति, तान् सर्वान् अतिरोचते ।
हिन्दी अर्थ
गार्ग्य ने कहा: मैं दर्पण में स्थित इस पुरुष की ही ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ। अजातशत्रु ने कहा: इस विषय में मुझसे बात मत बढ़ाइए; मैं इसकी उपासना दीप्तिमान् के रूप में करता हूँ। जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह दीप्तिमान् होता है, उसकी सन्तति दीप्तिमान् होती है और जिनसे वह मिलता है, उन सबको अपनी दीप्ति से बढ़ जाता है।
English meaning
Gargya said, “I meditate on this person in a mirror as Brahman.” Ajatashatru replied, “Do not pursue this account with me; I meditate on it as the shining one.” Whoever meditates on it in this way receives this result: That person becomes shining, that person’s offspring becomes shining, and that person outshines everyone encountered.
व्याख्या
दर्पण का प्रकाशमान रूप सामाजिक प्रभाव और दीप्ति के फल से जोड़ा गया है। यह सूर्य, बिजली और दर्पण जैसे अलग प्रकाशरूपों को एक ही ज्ञान मान लेने की सीमा भी दिखाता है।
Explanation
The luminous appearance in the mirror is connected with brilliance and distinction among others. The exchange also exposes the limit of treating the sun, lightning and a reflected image as interchangeable final knowledge.
संदर्भ
इस बार दर्पण में दिखने वाला पुरुष ध्यानविषय है।
Context
This time the proposed object is the person appearing in a mirror.