Passage 7.4
स होवाच गार्ग्यः य एवासौ विद्युति पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति । स होवाचाजातशत्रुः मा मैतस्मिन् संवदिष्ठाः । तेजस्वीति वा अहमेतमुपास इति । स य एतमेवमुपास्ते तेजस्वी ह भवति । तेजस्विनी हास्य प्रजा भवति ॥ ४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः ह गार्ग्यः उवाच-यः एव असौ विद्युति पुरुषः [अस्ति], एतम् एव अहम् ब्रह्म उपासे इति । सः ह अजातशत्रुः उवाच-मा मा एतस्मिन् संवदिष्ठाः । तेजस्वी इति वा अहम् एतम् उपासे इति । सः यः एतम् एवम् उपास्ते, [सः] ह तेजस्वी भवति; अस्य प्रजा ह तेजस्विनी भवति ।
हिन्दी अर्थ
गार्ग्य ने कहा: मैं बिजली में स्थित उस पुरुष की ही ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ। अजातशत्रु ने कहा: इस विषय में मुझसे बात मत बढ़ाइए; मैं इसकी उपासना तेजस्वी के रूप में करता हूँ। जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह तेजस्वी होता है और उसकी सन्तति भी तेजस्वी होती है।
English meaning
Gargya said, “I meditate on that person in lightning as Brahman.” Ajatashatru replied, “Do not pursue this account with me; I meditate on it as radiant.” Whoever meditates on it in this way receives this result: That person becomes radiant, and that person’s offspring becomes radiant.
व्याख्या
बिजली का तेज उपासक और उसकी सन्तति के तेज से जोड़ा जाता है। यह ध्यान-विषय और फल की समानता है; संवाद अभी सभी रूपों के आधार तक नहीं पहुँचा है।
Explanation
Lightning’s brilliance is linked with the brilliance of the meditator and offspring. The fruit resembles the object contemplated; the dialogue has not yet reached the basis of all forms.
संदर्भ
तीसरा प्रस्ताव बिजली के प्रकाश पर केन्द्रित है।
Context
The third proposal concerns the light of lightning.