Passage 11.14
अयमात्मा सर्वेषां भूतानां मधु । अस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु । यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमात्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मा । इदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १४ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अयम् आत्मा सर्वेषाम् भूतानाम् मधु [अस्ति] । अस्य आत्मनः सर्वाणि भूतानि मधु [सन्ति] । अस्मिन् आत्मनि यः च अयम् तेजोमयः अमृतमयः पुरुषः [अस्ति], यः च अयम् आत्मा तेजोमयः अमृतमयः पुरुषः [अस्ति], अयम् एव सः [अस्ति], यः अयम् आत्मा [अस्ति] । इदम् अमृतम् [अस्ति]; इदम् ब्रह्म [अस्ति]; इदम् सर्वम् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
यह आत्मरूप शरीर सभी प्राणियों का मधु है और इस आत्मरूप शरीर के लिए सभी प्राणी मधु हैं। जो इस आत्मरूप शरीर में तेजोमय और अमृतमय पुरुष है और जो यह तेजोमय अमृतमय आत्मा है, वही यह आत्मा है। यही अमृत है, यही ब्रह्म है और यही सब कुछ है।
English meaning
This embodied self is honey for all beings, and all beings are honey for this embodied self. The radiant, immortal person in this embodied self and this radiant, immortal Self are this very Self. This is the immortal; this is Brahman; this is everything.
व्याख्या
आत्मा का पहले प्रयोग देहरूप व्यक्ति और बाद में अन्तरस्थ आत्मा के अर्थ में पढ़ा गया है, जिससे पुनरुक्ति का आन्तरिक-बाह्य ढाँचा समझ आता है। यह व्याख्यात्मक भेद है; मूल सभी स्थानों पर आत्मा ही कहता है और इस बार अध्यात्मम् शब्द नहीं दोहराता।
Explanation
The earlier occurrences of atman are read as the embodied individual and the later occurrence as the inward Self, making sense of the litany’s outer/inner pattern. This distinction is interpretive: the Sanskrit uses atman throughout and does not repeat adhyatmam here.
संदर्भ
बार-बार आत्मा पर समाप्त होने वाली मधु-विद्या अब आत्मा को ही अपने प्रारम्भिक विषय के रूप में लेती है।
Context
The honey litany, which repeatedly concludes with the Self, now takes the self itself as its opening subject.