Passage 4.11
ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव । तदेकं सन्न व्यभवत् । तच्छ्रेयो रूपमत्यसृजत क्षत्रं, यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति । तस्मात्क्षत्रात्परं नास्ति । तस्माद्ब्राह्मणः क्षत्रियं अधस्तादुपास्ते राजसूये । क्षत्र एव तद्यशो दधाति । सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद्ब्रह्म । तस्माद्यद्यपि राजा परमतां गच्छति ब्रह्मैवान्तत उपनिश्रयति स्वां योनिम् । य उ एनं हिनस्ति स्वां स योनिमृच्छति । स पापीयान् भवति यथा श्रेयांसं हिंसित्वा ॥ ११ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अग्रे इदम् एकम् एव ब्रह्म वै आसीत् । तत् एकम् सत् न व्यभवत् । तत् श्रेयः रूपम् क्षत्रम् अत्यसृजत-यानि एतानि देवत्रा क्षत्राणि [सन्ति], इन्द्रः वरुणः सोमः रुद्रः पर्जन्यः यमः मृत्युः ईशानः इति । तस्मात् क्षत्रात् परम् न अस्ति । तस्मात् राजसूये ब्राह्मणः क्षत्रियम् अधस्तात् उपास्ते; तत् यशः क्षत्रे एव दधाति । यत् ब्रह्म [अस्ति], सा एषा क्षत्रस्य योनिः [अस्ति] । तस्मात् राजा परमताम् गच्छति यदि अपि, अन्ततः स्वाम् योनिम् ब्रह्म एव उपनिश्रयति । यः उ एनम् हिनस्ति, सः स्वाम् योनिम् ऋच्छति । सः पापीयान् भवति, यथा श्रेयांसम् हिंसित्वा [पापीयान् भवेत्] ।
हिन्दी अर्थ
आरम्भ में ब्रह्म अकेला था। अकेला होकर वह विस्तार या सामर्थ्य नहीं पा सका। उसने अपने से उत्कृष्ट रूप, क्षत्र, उत्पन्न किया: देवताओं में इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, पर्जन्य, यम, मृत्यु और ईशान जैसे शासनकारी रूप। इसलिए क्षत्र से ऊपर कुछ नहीं कहा गया। इसीलिए राजसूय में ब्राह्मण क्षत्रिय से नीचे बैठकर उसका सम्मान करता है और क्षत्र में यश स्थापित करता है। फिर भी क्षत्र का उद्गम ब्रह्म है। राजा सर्वोच्च पद पाने पर भी अन्त में अपने उद्गम ब्रह्म का ही आश्रय लेता है। जो उसे चोट पहुँचाता है, वह अपने ही उद्गम को चोट पहुँचाता है और श्रेष्ठ को हानि पहुँचाने वाले की तरह पापग्रस्त होता है।
English meaning
At first brahman was alone. Alone, it could not develop its power. It brought forth a superior form, kshatra, ruling authority: the divine powers called Indra, Varuna, Soma, Rudra, Parjanya, Yama, Death and Ishana. Thus the text says there is nothing above kshatra. At the royal consecration a brahmin therefore honours the kshatriya from a lower seat, placing glory in ruling authority. Yet brahman is the source of kshatra. Even when a king reaches supremacy, he ultimately relies on brahman as his own source. One who harms it harms their own source and incurs evil, as does someone who injures a superior.
व्याख्या
राजसूय का बैठने का क्रम राजसत्ता और ब्राह्मणीय अनुष्ठानिक सत्ता के सम्बन्ध को दिखाता है। यह वर्णाधारित ऐतिहासिक व्यवस्था का आन्तरिक तर्क है। उसे वर्तमान मनुष्यों की जन्माधारित श्रेष्ठता या अधिकार का प्रमाण नहीं माना गया है।
Explanation
Seating at the royal consecration illustrates the relation between royal and brahminical ritual authority. This is an internal account of a historical varna-based order, not evidence for present-day superiority or entitlement by birth.
संदर्भ
ब्रह्म-आत्मा की पहचान के बाद पाठ सामाजिक और दैवी अधिकार की उत्पत्ति की ओर मुड़ता है।
Context
After the identity of brahman and self, the text turns to the origin of social and divine authority.