Passage 4.2
सोऽबिभेत्तस्मादेकाकी बिभेति । स हायमीक्षां चक्रे, यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति । तत एवास्य भयं वीयाय । कस्माद्ध्यभेष्यत् । द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः अबिभेत्; तस्मात् एकाकी बिभेति । सः ह अयम् ईक्षाम् चक्रे-यत् मत् अन्यत् न अस्ति, कस्मात् नु बिभेमि इति । ततः एव अस्य भयम् वीयाय । हि कस्मात् अभेष्यत्? द्वितीयात् वै भयम् भवति ।
हिन्दी अर्थ
वह डर गया; इसलिए अकेला व्यक्ति डरता है। फिर उसने विचार किया: जब मेरे अतिरिक्त कोई नहीं है, तो मैं किससे डरता हूँ? उसी से उसका भय चला गया। वह किससे डरता? भय दूसरे से होता है।
English meaning
It became afraid; hence a person alone is afraid. It then reflected, “If there is nothing other than me, what am I afraid of?” Its fear departed through that reflection. What could it have feared? Fear arises from a second.
व्याख्या
यहाँ भय का कारण एक सम्भावित दूसरे का अनुभव है। कथा उस द्वैत की अनुपस्थिति के विचार से भय मिटाती है। यह दार्शनिक कथन है, न कि वास्तविक खतरे को अनदेखा करने या मानसिक स्वास्थ्य की कठिनाइयों को केवल विचार से मिटा देने की सलाह।
Explanation
Fear is linked here with the presence of a possible other. Reflection on the absence of that duality dissolves fear within the story. This is a philosophical claim, not advice to ignore real danger or an assurance that mental-health difficulties disappear through thought alone.
संदर्भ
आत्म-पहचान के बाद कथा अकेलेपन के भय का सामना करती है।
Context
After self-recognition, the narrative confronts the fear of being alone.