Passage 4.7
तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् । तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतासौ नामायमिदंरूप इति । तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियत असौ नामायमिदंरूप इति । स एष इह प्रविष्ट आ नखाग्रेभ्यो यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्याद्विश्वम्भरो वा विश्वम्भरकुलाये । तं न पश्यन्ति । अकृत्स्नो हि सः प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति । वदन् वाक्पश्यंश्चक्षुः शृण्वञ्छ्रोत्रं मन्वानो मनः । तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव । स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेद । अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवति । आत्मेत्येवोपासीत । अत्र ह्येते सर्व एकं भवन्ति । तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्मा । अनेन ह्येतत्सर्वं वेद । यथा ह वै पदेनानुविन्देदेवं कीर्तिं श्लोकं विन्दते य एवं वेद ॥ ७ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तत् ह इदम् तर्हि अव्याकृतम् आसीत् । तत् नामरूपाभ्याम् एव असौ नाम अयम् इदंरूपः इति व्याक्रियत । तत् इदम् अपि एतर्हि नामरूपाभ्याम् एव असौ नाम अयम् इदंरूपः इति व्याक्रियते । सः एषः आ नखाग्रेभ्यः इह प्रविष्टः [अस्ति], यथा क्षुरः क्षुरधाने अवहितः स्यात्, विश्वम्भरः वा विश्वम्भरकुलाये [अवहितः स्यात्] । तम् न पश्यन्ति; हि सः अकृत्स्नः [अस्ति] । प्राणन् एव प्राणः नाम भवति; वदन् वाक् [नाम भवति]; पश्यन् चक्षुः [नाम भवति]; शृण्वन् श्रोत्रम् [नाम भवति]; मन्वानः मनः [नाम भवति] । तानि अस्य एतानि कर्मनामानि एव [सन्ति] । यः अतः एकैकम् उपास्ते, सः न वेद । हि एषः अतः एकैकेन अकृत्स्नः भवति । आत्मा इति एव उपासीत । हि अत्र एते सर्वे एकम् भवन्ति । यत् अयम् आत्मा [अस्ति], तत् एतत् अस्य सर्वस्य पदनीयम् [अस्ति] । हि अनेन एतत् सर्वम् वेद । यथा ह वै पदेन अनुविन्देत्, एवम् यः एवम् वेद, [सः] कीर्तिम् श्लोकम् विन्दते ।
हिन्दी अर्थ
उस समय यह सब अव्याकृत था। नाम और रूप से उसका विभाजन हुआ: इसका यह नाम है, यह इसका रूप है। आज भी इसी तरह नाम और रूप से भेद किया जाता है। वह यहाँ नखों के अग्रभाग तक प्रविष्ट है, जैसे उस्तरा अपने खोल में या अग्नि अपने आश्रय में छिपा हो। लोग उसे नहीं देखते, क्योंकि किसी एक क्रिया में वह पूरा प्रकट नहीं होता। साँस लेते हुए वह प्राण कहलाता है; बोलते हुए वाणी, देखते हुए चक्षु, सुनते हुए श्रोत्र और विचार करते हुए मन। ये उसके कर्मों के नाम हैं। जो इनमें से एक-एक को ही उपासता है, वह नहीं जानता; एक-एक में वह अधूरा है। आत्मा के रूप में ही उसकी उपासना करे, क्योंकि यहाँ ये सब एक होते हैं। यही आत्मा इस सबका खोजने योग्य पदचिह्न है; इसके द्वारा सब जाना जाता है। जैसे पदचिह्न से खोजा जाता है, वैसे ही इसे जानने वाला कीर्ति और यश पाता है।
English meaning
At that time all this was undifferentiated. It became differentiated through name and form: “This is its name; this is its form.” Even now distinctions are made through name and form in that way. It has entered here down to the tips of the nails, like a razor hidden in its case or fire within its receptacle. People do not see it, for it is not displayed in completeness in any single function. When breathing it is called breath; when speaking, speech; when seeing, sight; when hearing, hearing; and when thinking, mind. These are names of its activities. Whoever contemplates only one of them does not know it, for in each separately it is incomplete. It should be contemplated as the self, in which all these become one. This self is the track by which all this can be sought and known. As one finds something through a track, so the knower finds renown and praise.
व्याख्या
इन्द्रियों और क्रियाओं को आत्मा से पृथक् स्वतंत्र संपूर्णता मानना यहाँ अपर्याप्त कहा गया है। पदचिह्न की उपमा ज्ञान की दिशा बताती है: अलग-अलग कार्यों से उस एक आधार की खोज। विश्वम्भर को अग्नि और उसके कुलाय को उसका आश्रय समझना एक व्याख्या है, इसलिए उसे समीक्षा-योग्य रखा गया है।
Explanation
Treating the faculties and activities as separate complete realities is judged insufficient. The track image supplies a direction of inquiry: from the different functions toward their common basis. Identifying Vishvambhara as fire and its kulaya as a receptacle is an interpretation retained for review.
संदर्भ
सृष्टि की उत्पत्ति से अब नाम-रूप और शरीर में आत्मा की उपस्थिति पर विचार आता है।
Context
The account turns from the production of the world to name and form, and the self’s presence in the body.