Passage 4.17
आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव । सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेय । अथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति । एतावान् वै कामः । नेच्छंश्चनातो भूयो विन्देत् । तस्मादप्येतर्ह्येकाकी कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति । स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते । तस्यो कृत्स्नता । मन एवास्यात्मा । वाग्जाया । प्राणः प्रजा । चक्षुर्मानुषं वित्तम् । चक्षुषा हि तद्विन्दते । श्रोत्रं दैवम् । श्रोत्रेण हि तच्छृणोति । आत्मैवास्य कर्म । आत्मना हि कर्म करोति । स एष पाङ्क्तो यज्ञः । पाङ्क्तः पशुः । पाङ्क्तः पुरुषः । पाङ्क्तमिदं सर्वं यदिदं किञ्च । तदिदं सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥ १७ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अग्रे इदम् एकः एव आत्मा एव आसीत् । सः अकामयत-जाया मे स्यात्, अथ प्रजायेय, अथ वित्तम् मे स्यात्, अथ कर्म कुर्वीय इति । कामः एतावान् वै [अस्ति]; इच्छन् चन अतः भूयः न विन्देत् । तस्मात् अपि एतर्हि एकाकी कामयते-जाया मे स्यात्, अथ प्रजायेय, अथ वित्तम् मे स्यात्, अथ कर्म कुर्वीय इति । सः यावत् अपि एतेषाम् एकैकम् न प्राप्नोति, तावत् अकृत्स्नः एव [आत्मानम्] मन्यते । तस्य उ कृत्स्नता [उच्यते] । अस्य मनः एव आत्मा [अस्ति]; वाक् जाया [अस्ति]; प्राणः प्रजा [अस्ति]; चक्षुः मानुषम् वित्तम् [अस्ति], हि चक्षुषा तत् विन्दते । श्रोत्रम् दैवम् [वित्तम् अस्ति], हि श्रोत्रेण तत् शृणोति । अस्य आत्मा एव कर्म [अस्ति], हि आत्मना कर्म करोति । सः एषः पाङ्क्तः यज्ञः [अस्ति]; पशुः पाङ्क्तः [अस्ति]; पुरुषः पाङ्क्तः [अस्ति] । यत् इदम् किञ्च [अस्ति], इदम् सर्वम् पाङ्क्तम् [अस्ति] । यः एवम् वेद, [सः] तत् इदम् सर्वम् आप्नोति ।
हिन्दी अर्थ
आरम्भ में आत्मा ही अकेला था। उसने चाहा: मेरी पत्नी हो, मैं सन्तान उत्पन्न करूँ; मेरे पास धन हो और मैं कर्म करूँ। इच्छा का विस्तार इतना ही कहा गया है; चाहने पर भी इससे अधिक नहीं मिलता। आज भी अकेला व्यक्ति यही चाहता है: पत्नी, सन्तान, धन और कर्म। इनमें से एक-एक के न मिलने तक वह अपने को अधूरा मानता है। उसकी पूर्णता का यह भी रूप है: मन उसका आत्मा, वाणी पत्नी, प्राण सन्तान, चक्षु मानवीय धन है, क्योंकि आँखों से उसे पाता है; श्रोत्र दैवी धन है, क्योंकि सुनकर उसे ग्रहण करता है; शरीर उसका कर्म है, क्योंकि शरीर से कर्म करता है। यह यज्ञ पाँच अंगों वाला है, पशु पाँच अंगों वाला है, पुरुष पाँच अंगों वाला है और जो कुछ भी है, वह सब पाँच अंगों वाला है। जो ऐसा जानता है, वह यह सब प्राप्त करता है।
English meaning
In the beginning the self was alone. It desired, “May I have a wife, produce offspring, possess wealth and perform action.” The text calls this the extent of desire: even wishing, one would find nothing beyond it. Even now a person alone desires wife, offspring, wealth and action, and regards himself as incomplete until each is obtained. Here too is his completeness: mind is his self; speech his wife; breath his offspring; sight his human wealth, for through sight he obtains it; hearing his divine wealth, for through hearing he receives it; and the body his action, for with the body he acts. This sacrifice is fivefold, the animal is fivefold, the person is fivefold, and everything here is fivefold. One who knows this obtains all this.
व्याख्या
यह पुरुष गृहस्थ के प्राचीन आदर्श की भाषा है, सभी मनुष्यों के जीवनलक्ष्य का अनिवार्य विधान नहीं। मानवीय और दैवी धन एक धन-स्थान के दो पक्ष हैं; आत्मा, पत्नी, सन्तान, धन और कर्म मिलकर पाँच का विन्यास बनाते हैं। पाङ्क्त का सम्बन्ध पाँच-अंगी संरचना और पङ्क्ति छन्द के अनुष्ठानिक संकेत से है।
Explanation
The language describes an ancient male householder ideal, not mandatory goals for every human life. Human and divine wealth are two aspects of one position in the scheme; self, spouse, offspring, wealth and action make five. Pankta evokes a fivefold structure and the ritual associations of the Pankti metre.
संदर्भ
चौथा ब्राह्मण गृहस्थ की कामनाओं को मन, वाणी, प्राण और देह की आन्तरिक संरचना से जोड़कर समाप्त होता है।
Context
The fourth brahmana closes by relating a householder’s desires to an inner arrangement of mind, speech, breath and body.