Passage 4.15
तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट्शूद्रः । तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माभवद्ब्राह्मणो मनुष्येषु, क्षत्रियेण क्षत्रियः, वैश्येन वैश्यः, शूद्रेण शूद्रः । तस्मादग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे मनुष्येषु । एताभ्यां हि रूपाभ्यां ब्रह्माभवत् । अथ यो ह वा अस्माल्लोकात्स्वं लोकमदृष्ट्वा प्रैति स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाननूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतम् । यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एव । आत्मानमेव लोकमुपासीत । स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयते । अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत्सृजते ॥ १५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
तत् एतत् ब्रह्म क्षत्रम् विट् शूद्रः [इति अस्ति] । तत् अग्निना एव देवेषु ब्रह्म अभवत्; मनुष्येषु ब्राह्मणः [अभवत्]; क्षत्रियेण क्षत्रियः [अभवत्]; वैश्येन वैश्यः [अभवत्]; शूद्रेण शूद्रः [अभवत्] । तस्मात् देवेषु अग्नौ एव लोकम् इच्छन्ते, मनुष्येषु ब्राह्मणे [इच्छन्ते] । हि एताभ्याम् रूपाभ्याम् ब्रह्म अभवत् । अथ यः ह वै अस्मात् लोकात् स्वम् लोकम् अदृष्ट्वा प्रैति, सः अविदितः [लोकः] एनम् न भुनक्ति, यथा वेदः वा अननूक्तः, अन्यत् वा कर्म अकृतम् [न भुनक्ति] । यदि ह वै अपि अनेवंवित् महत् पुण्यम् कर्म करोति, तत् ह अस्य अन्ततः क्षीयते एव । आत्मानम् एव लोकम् उपासीत । यः आत्मानम् एव लोकम् उपास्ते, अस्य कर्म न ह क्षीयते । हि अस्मात् एव आत्मनः यत् यत् कामयते, तत् तत् सृजते ।
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार ब्रह्म, क्षत्र, विश् और शूद्र हुए। देवताओं में अग्नि द्वारा ब्रह्म प्रकट हुआ और मनुष्यों में ब्राह्मण द्वारा; क्षत्रिय द्वारा क्षत्रिय, वैश्य द्वारा वैश्य और शूद्र द्वारा शूद्र। इसलिए देवताओं में अग्नि और मनुष्यों में ब्राह्मण के माध्यम से लोक की कामना की जाती है, क्योंकि इन दो रूपों में ब्रह्म प्रकट हुआ। जो इस लोक से अपने लोक को देखे बिना चला जाता है, उसका वह अज्ञात लोक उसे लाभ नहीं देता, जैसे न पढ़ा हुआ वेद या न किया हुआ कर्म। ऐसा न जानने वाला बड़ा पुण्यकर्म भी करे, तो उसका फल अन्त में क्षीण हो जाता है। आत्मा को ही अपना लोक मानकर उपासना करे। जो ऐसा करता है, उसका कर्म क्षीण नहीं होता, क्योंकि इसी आत्मा से वह अपनी इच्छित वस्तुओं को उत्पन्न करता है।
English meaning
Thus there are brahman, kshatra, vish and shudra. Among the gods brahman became manifest as fire, and among humans as the brahmin; through the kshatriya as kshatriya, through the vaishya as vaishya, and through the shudra as shudra. People therefore seek a world through fire among the gods and through the brahmin among humans, for brahman appeared in these two forms. But one who departs this world without seeing their own world receives no benefit from that unknown world, just as from an unrecited Veda or an unperformed act. Even great meritorious action by one who lacks this knowledge eventually runs out. One should contemplate the self as one’s world. The action of someone who does so does not run out, for from this self they produce whatever they desire.
व्याख्या
अनुष्ठानिक और सामाजिक रूपों का ज्ञान मात्र अपने लोक, अर्थात् आत्मा, को जानने का स्थान नहीं लेता। वेद और कर्म की उपमा ज्ञान के उपयोगी होने पर बल देती है। सामाजिक पदों के ऐतिहासिक दावे जस के तस दर्ज हैं, उनका आज के लिए समर्थन नहीं किया गया।
Explanation
Knowing the ritual and social forms does not replace knowing one’s own world, the self. The Veda-and-action analogy emphasizes knowledge made effective. The historical claims about social positions are recorded without endorsing their authority today.
संदर्भ
वर्णों की उत्पत्ति का संक्षेप करने के बाद विचार फिर आत्मज्ञान और कर्म के फल पर लौटता है।
Context
After summarizing the origin of the classes, the discussion returns to self-knowledge and the results of action.