Passage 4.10
ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् । तदात्मानमेवावेत् । अहं ब्रह्मास्मीति । तस्मात्तत्सर्वमभवत् । तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् । तथर्षीनाम् । तथा मनुष्याणाम् । तद्धैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्चेति । तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति । तस्य ह न देवाश्चनाभूत्या ईशते । आत्मा ह्येषां स भवति । अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद । यथा पशुरेवं स देवानाम् । यथा ह वै बहवः पशवो मनुष्यं भुञ्ज्युरेवमेकैकः पुरुषो देवान् भुनक्ति । एकस्मिन्नेव पशावादीयमानेऽप्रियं भवति किमु बहुषु । तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः ॥ १० ॥
पदच्छेद
अन्वय
अग्रे इदम् ब्रह्म वै आसीत् । तत् आत्मानम् एव अहम् ब्रह्म अस्मि इति अवेत् । तस्मात् तत् सर्वम् अभवत् । देवानाम् यः यः प्रत्यबुध्यत, सः एव तत् अभवत्; तथा ऋषीणाम् [अभवत्], तथा मनुष्याणाम् [अभवत्] । तत् ह एतत् पश्यन् ऋषिः वामदेवः अहम् मनुः अभवम् सूर्यः च इति प्रतिपेदे । तत् इदम् अपि एतर्हि यः अहम् ब्रह्म अस्मि इति एवम् वेद, सः इदम् सर्वम् भवति । तस्य ह देवाः चन अभूत्यै न ईशते; हि सः एषाम् आत्मा भवति । अथ यः अन्याम् देवताम् असौ अन्यः, अहम् अन्यः अस्मि इति उपास्ते, सः न वेद । यथा पशुः [अस्ति], एवम् सः देवानाम् [अस्ति] । यथा ह वै बहवः पशवः मनुष्यम् भुञ्ज्युः, एवम् एकैकः पुरुषः देवान् भुनक्ति । एकस्मिन् एव पशौ आदीयमाने अप्रियम् भवति; बहुषु किम् उ [भवेत्]? तस्मात् यत् एतत् मनुष्याः विद्युः, तत् एषाम् न प्रियम् [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
आरम्भ में यह सब ब्रह्म था। उसने स्वयं को ही जाना: मैं ब्रह्म हूँ। इसलिए वह सब कुछ हुआ। देवताओं में जिसने यह पहचाना, वही वह हुआ; ऋषियों और मनुष्यों में भी ऐसा ही है। इसे देखते हुए ऋषि वामदेव ने जाना: मैं मनु हुआ और सूर्य भी। आज भी जो जानता है कि मैं ब्रह्म हूँ, वह यह सब हो जाता है। देवता भी उसे ऐसा होने से रोक नहीं सकते, क्योंकि वह उनका आत्मा हो जाता है। लेकिन जो किसी दूसरे देवता की उपासना इस भाव से करता है कि वह अलग है और मैं अलग हूँ, वह नहीं जानता। वह देवताओं के लिए पशु जैसा है। जैसे अनेक पशु एक मनुष्य का पोषण करते हैं, वैसे ही एक-एक मनुष्य देवताओं का पोषण करता है। एक पशु के छिन जाने पर भी अप्रिय लगता है, फिर बहुतों की बात ही क्या! इसलिए देवताओं को यह प्रिय नहीं कि मनुष्य इसे जान लें।
English meaning
In the beginning this was brahman. It knew itself: “I am brahman.” Through that it became everything. Whichever of the gods recognized this became that; so too among seers and human beings. Seeing this, the seer Vamadeva realized, “I became Manu and the sun.” Even now, one who knows “I am brahman” becomes all this. Even the gods cannot prevent that attainment, for the knower becomes their self. But one who worships another deity thinking “That one is separate, and I am separate” does not know. Such a person is like an animal belonging to the gods. Just as many animals support a human being, each human supports the gods. Losing even one animal is unwelcome, much more many. Thus the gods do not welcome human beings coming to know this.
व्याख्या
यहाँ “मैं” का दावा व्यक्तिगत श्रेष्ठता नहीं बल्कि ब्रह्म से अभिन्न आत्मा की पहचान है। पशु और पालक की उपमा देवताओं पर निर्भर अनुष्ठानिक सम्बन्ध की तीखी आलोचना करती है। इसे आज किसी भक्त या समुदाय को नीचा दिखाने का आधार नहीं बनाया गया। वामदेव का कथन पाठ में ऋषि की अनुभूति के रूप में उद्धृत है।
Explanation
The “I” here is not a claim of personal superiority but recognition of the self as not separate from brahman. The animal-and-owner analogy sharply criticizes ritual dependence on the gods. It is not used to demean present-day worshippers or communities. Vamadeva’s declaration is quoted as a seer’s realization.
संदर्भ
पिछले प्रश्न का उत्तर ब्रह्म की स्वयं की पहचान है। यही प्रसिद्ध महावाक्य का प्रसंग है।
Context
The answer to the preceding question is brahman’s recognition of itself, the setting of the famous great saying.