Passage 4.5
सोऽवेदहं वाव सृष्टिरस्म्यहं हीदं सर्वमसृक्षीति । ततः सृष्टिरभवत् । सृष्ट्यां हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
सः अवेत्-अहम् वाव सृष्टिः अस्मि; अहम् हि इदम् सर्वम् असृक्षि इति । ततः सृष्टिः अभवत् । यः एवम् वेद, [सः] अस्य एतस्याम् सृष्ट्याम् ह भवति ।
हिन्दी अर्थ
उसने जाना: मैं ही सृष्टि हूँ, क्योंकि मैंने ही यह सब उत्पन्न किया है। इस प्रकार वह सृष्टि हुआ। जो ऐसा जानता है, वह उसकी इस सृष्टि में स्थान पाता है।
English meaning
It understood, “I am creation itself, for I have created all this.” Thus it became creation. Whoever knows this finds a place in that creation of its own.
व्याख्या
“मैं सृष्टि हूँ” केवल वस्तुओं का बाहरी निर्माता होने से आगे बढ़ता है। उत्पन्न जगत् और उत्पत्ति के आधार का सम्बन्ध यहाँ आत्म-पहचान में रखा जाता है। अंतिम फल-वाक्य उस पहचान में सहभागी होने की बात करता है।
Explanation
“I am creation” goes beyond being an external maker of objects. It places the relation between the world produced and its source within self-recognition. The closing benefit describes participation in that recognition.
संदर्भ
पशुयुग्मों की उत्पत्ति के बाद सर्जक अपने को सृष्टि के रूप में पहचानता है।
Context
After the generation of animal pairs, the creator recognizes itself as creation.