Passage 44.3
अथैनं वसत्योपमन्त्रयां चक्रे । अनादृत्य वसतिं कुमारः प्रदुद्राव । स आजगाम पितरम् । तं होवाच इति वाव किल नो भवान् पुरानुशिष्टानवोच इति । कथं सुमेध इति । पञ्च मा प्रश्नान् राजन्यबन्धुरप्राक्षीत् । ततो नैकं चन वेदेति । कतमे त इति । इम इति ह प्रतीकान्युदाजहार ॥ ३ ॥
पदच्छेद
अन्वय
अथ [राजा] एनम् वसत्या उपमन्त्रयाम् चक्रे । कुमारः वसतिम् अनादृत्य प्रदुद्राव । सः पितरम् आजगाम । [सः] तम् ह, इति वाव किल भवान् नः पुरा अनुशिष्टान् अवोचः इति उवाच । [पिता], सुमेधः, कथम् इति [पप्रच्छ] । [पुत्रः], राजन्यबन्धुः मा पञ्च प्रश्नान् अप्राक्षीत्; ततः एकम् चन न वेद इति [उवाच] । [पिता], ते कतमे इति [पप्रच्छ] । [पुत्रः], इमे इति ह प्रतीकानि उदाजहार ।
हिन्दी अर्थ
तब राजा ने उसे ठहरने का निमन्त्रण दिया। निवास का निमन्त्रण स्वीकार किए बिना कुमार तेजी से निकल गया। वह अपने पिता के पास पहुँचा और बोला, “तो आपने पहले हमें पूर्ण रूप से शिक्षित कह दिया था!” पिता ने पूछा, “क्या हुआ, बुद्धिमान पुत्र?” उसने कहा, “एक राजन्य-बन्धु ने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे। उनमें से एक भी मैं नहीं जानता।” पिता ने पूछा, “वे कौन-से थे?” उसने कहा, “ये,” और प्रश्नों के आरम्भिक शब्द सुनाए।
English meaning
Then the king invited him to stay. Disregarding the invitation, the young man hurried away. He came to his father and said, “So you had earlier declared us instructed!” His father asked, “What is it, intelligent son?” He replied, “A mere kinsman of the ruling class asked me five questions, and I do not know even one of them.” His father asked, “Which were they?” Saying “These,” he recited their opening words.
व्याख्या
राजन्य-बन्धु युवक का तिरस्कारपूर्ण संबोधन है, सम्पादक का जातिगत निर्णय नहीं। प्रतीकानि बताता है कि उसने केवल आरम्भिक संकेत दुहराए; प्रश्न फिर से पूरे मूल में नहीं दिए गए हैं।
Explanation
The dismissive expression “kinsman of the ruling class” belongs to the youth, not the editor’s assessment of caste. Pratikani indicates that he repeated the opening cues; the source does not print all the questions again.
संदर्भ
प्रश्नों का उत्तर न दे पाने के बाद श्वेतकेतु अपने पिता से शिकायत करता है। पिता प्रश्नों की सामग्री जानना चाहते हैं।
Context
Unable to answer, Shvetaketu complains to his father, who asks to hear the questions themselves.