Passage 44.11
अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम । तस्य पृथिव्येव समित् । अग्निर्धूमः । रात्रिरर्चिः । चन्द्रमा अङ्गाराः । नक्षत्राणि विष्फुलिङ्गाः । तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति । तस्या आहुत्या अन्नं संभवति ॥ ११ ॥
पदच्छेद
अन्वय
गौतम, अयम् लोकः वै अग्निः [अस्ति] । तस्य पृथिवी एव समित् [अस्ति]; अग्निः धूमः [अस्ति]; रात्रिः अर्चिः [अस्ति]; चन्द्रमाः अङ्गाराः [अस्ति]; नक्षत्राणि विष्फुलिङ्गाः [सन्ति] । तस्मिन् एतस्मिन् अग्नौ देवाः वृष्टिम् जुह्वति; तस्याः आहुत्याः अन्नम् सम्भवति ।
हिन्दी अर्थ
“गौतम, यह लोक अग्नि है। पृथिवी ही उसकी समिधा है; अग्नि धुआँ है; रात ज्वाला है; चन्द्रमा अंगारे हैं; नक्षत्र चिनगारियाँ हैं। देवता इस अग्नि में वर्षा की आहुति देते हैं। उस आहुति से अन्न उत्पन्न होता है।”
English meaning
“Gautama, this world is a fire. Earth is its fuel; fire is its smoke; night is its flame; the moon is its embers; the stars are its sparks. In this fire the gods offer rain. From that offering food arises.”
व्याख्या
यहाँ वास्तविक अग्नि को बड़े प्रतीकात्मक अग्नि-लोक का धुआँ कहा गया है। रात को ज्वाला कहना भी बताता है कि यह सरल प्राकृतिक वर्गीकरण नहीं, यज्ञ-सादृश्य है।
Explanation
Literal fire is called the smoke of the larger symbolic world-fire. Calling night the flame likewise signals sacrificial analogy rather than a simple natural classification.
संदर्भ
तीसरी अग्नि इस पृथ्वी-लोक की है। वर्षा का परिणाम अब भोजन के रूप में सामने आता है।
Context
The third fire belongs to this earthly world. Rain now yields food.