Passage 44.2
वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयत्यो विप्रतिपद्यन्ता३ इति । नेति होवाच । वेत्थो यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता३ इति । नेति हैवोवाच । वेत्थो यथासौ लोक एवं बहुभिः पुनः पुनः प्रयद्भिर्न संपूर्यता३ इति । नेति हैवोवाच । वेत्थो यतिथ्यामाहुत्यां हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्ती३ इति । नेति हैवोवाच । वेत्थो देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य वा । यत्कृत्वा देवयानं वा पन्थानं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वा । अपि हि न ऋषेर्वचः श्रुतं द्वे सृती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् । ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं मातरं चेति । नाहमत एकं चन वेदेति होवाच ॥ २ ॥
पदच्छेद
अन्वय
[राजा], इमाः प्रजाः प्रयत्यः यथा विप्रतिपद्यन्ता३ इति [किम्] वेत्थ [इति पप्रच्छ] । [श्वेतकेतुः], न इति ह उवाच । [राजा], यथा [इमाः प्रजाः] इमम् लोकम् पुनः आपद्यन्ता३ इति वेत्थ उ [इति पप्रच्छ] । [सः], न इति ह एव उवाच । [राजा], यथा असौ लोकः एवम् बहुभिः पुनः पुनः प्रयद्भिः न सम्पूर्यता३ इति वेत्थ उ [इति पप्रच्छ] । [सः], न इति ह एव उवाच । [राजा], यतिथ्याम् आहुत्याम् हुतायाम् आपः पुरुषवाचः भूत्वा समुत्थाय वदन्ती३ इति वेत्थ उ [इति पप्रच्छ] । [सः], न इति ह एव उवाच । [राजा], देवयानस्य वा पथः प्रतिपदम्, पितृयाणस्य वा [प्रतिपदम्] वेत्थ उ [इति पप्रच्छ]; यत् [कर्म] कृत्वा देवयानम् वा पन्थानम् प्रतिपद्यन्ते, पितृयाणम् वा [प्रतिपद्यन्ते] । अपि हि नः ऋषेः वचः श्रुतम् [अस्ति]—अहम् पितॄणाम् [एकाम्], देवानाम् [अपराम्], उत मर्त्यानाम् [सम्बन्धिन्यौ] द्वे सृती अशृणवम् । यत् पितरम् मातरम् च अन्तरा [अस्ति], इदम् विश्वम् एजत् ताभ्याम् समेति इति । [श्वेतकेतुः], अहम् अतः एकम् चन न वेद इति ह उवाच ।
हिन्दी अर्थ
उन्होंने पूछा, “क्या तुम जानते हो कि यहाँ से जाते हुए ये प्राणी किस प्रकार अलग-अलग मार्गों पर जाते हैं?” उसने कहा, “नहीं।” “क्या तुम जानते हो कि वे इस लोक में फिर कैसे लौटते हैं?” उसने फिर कहा, “नहीं।” “क्या तुम जानते हो कि इतने लोगों के बार-बार वहाँ जाने पर भी वह लोक क्यों नहीं भर जाता?” उसने फिर कहा, “नहीं।” “क्या तुम जानते हो कि कौन-सी संख्या की आहुति पड़ने पर जल मानव-वाणी वाला होकर उठता और बोलता है?” उसने फिर कहा, “नहीं।” “क्या तुम देवयान मार्ग अथवा पितृयान मार्ग का प्रवेश जानते हो, और वह क्या करने से प्राप्त होता है जिससे लोग देवयान अथवा पितृयान मार्ग पर जाते हैं? क्या हमने ऋषि का यह वचन नहीं सुना है: ‘मैंने दो पथ सुने हैं, पितरों के और देवों के, और मर्त्यों के। उनके द्वारा यह सब चलायमान जगत्, जो पिता और माता के बीच है, आवागमन करता है।’” श्वेतकेतु ने कहा, “मैं इनमें से एक भी नहीं जानता।”
English meaning
He asked, “Do you know how these beings, when they depart, go their separate ways?” He answered, “No.” “Do you know how they return to this world?” Again he said, “No.” “Do you know why that world does not become full, although so many keep going there?” Again he said, “No.” “Do you know at which numbered offering, once it has been made, the waters acquire a human voice, rise and speak?” Again he said, “No.” “Do you know the entrance to the path of the gods or the path of the ancestors, and what people do to enter either the path of the gods or the path of the ancestors? Have we not heard the seer’s saying: ‘I have heard of two courses, of ancestors and of gods, and of mortals. By these all this moving universe passes, whatever lies between father and mother.’” Shvetaketu said, “I do not know even one of these.”
व्याख्या
चौथे प्रश्न का उत्तर पाँच अग्नियों की शृंखला देगी; अन्तिम प्रश्न दो मरणोत्तर मार्गों से जुड़ता है। पिता-माता का ऋचा-बिम्ब आकाश-पृथिवी के बीच के जगत् को भी इंगित करता है। “मर्त्यों के” को स्रोत के अनुसार रखा गया है; दो पथों में उसका सम्बन्ध व्याख्येय है।
Explanation
The fourth question leads to the five-fire sequence, while the last concerns two postmortem routes. The verse’s father-and-mother image also evokes the world between heaven and earth. “Of mortals” is retained, although its relation to the two courses requires interpretation.
संदर्भ
राजा पाँच प्रश्न रखते हैं: प्रस्थान, लौटना, परलोक का न भरना, जल से मानव का उदय और दो मार्गों का प्रवेश।
Context
The king presents five questions: departure, return, the other world not filling, the emergence of a human from water, and entry into the two paths.