Passage 44.12
पुरुषो वा अग्निर्गौतम । तस्य व्यात्तमेव समित् । प्राणो धूमः । वागर्चिः । चक्षुरङ्गाराः । श्रोत्रं विष्फुलिङ्गाः । तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति । तस्या आहुत्यै रेतः संभवति ॥ १२ ॥
पदच्छेद
अन्वय
गौतम, पुरुषः वा अग्निः [अस्ति] । तस्य व्यात्तम् एव समित् [अस्ति]; प्राणः धूमः [अस्ति]; वाक् अर्चिः [अस्ति]; चक्षुः अङ्गाराः [अस्ति]; श्रोत्रम् विष्फुलिङ्गाः [अस्ति] । तस्मिन् एतस्मिन् अग्नौ देवाः अन्नम् जुह्वति; तस्याः आहुत्यै रेतः सम्भवति ।
हिन्दी अर्थ
“गौतम, पुरुष अग्नि है। उसका खुला मुख ही समिधा है; श्वास धुआँ है; वाणी ज्वाला है; आँख अंगारे हैं; कान चिनगारियाँ हैं। देवता इस अग्नि में अन्न की आहुति देते हैं। उस आहुति से वीर्य उत्पन्न होता है।”
English meaning
“Gautama, a man is a fire. His open mouth is the fuel; breath is the smoke; speech is the flame; the eye is the embers; the ear is the sparks. In this fire the gods offer food. From that offering semen arises.”
व्याख्या
पुरुष यहाँ वीर्य उत्पन्न करने वाले पुरुष के अर्थ में है। भोजन और प्रजनन का यह यज्ञात्मक सम्बन्ध प्राचीन शरीर-दृष्टि है, आधुनिक जैविक प्रक्रिया का पूरा वर्णन नहीं।
Explanation
Purusha here denotes the male producer of semen. This sacrificial relation between food and reproduction is an ancient view of the body, not a complete modern biological account.
संदर्भ
चौथी अग्नि में ब्रह्माण्ड से मानव शरीर की ओर संक्रमण है। अन्न अगली जनन-सामग्री में बदलता है।
Context
The fourth fire moves from the cosmos to the human body. Food is transformed into the material of generation.