Passage 44.15
ते य एवमेतद्विदुर्ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसंभवन्ति । अर्चिषोऽहः । अह्न आपूर्यमाणपक्षम् । आपूर्यमाणपक्षाद्यान् षण्मासानुदङ्ङादित्य एति । मासेभ्यो देवलोकम् । देवलोकादादित्यम् । आदित्याद्वैद्युतम् । तान् वैद्युतान् पुरुषो मानस एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति । ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति । तेषां न पुनरावृत्तिः ॥ १५ ॥
पदच्छेद
अन्वय
ते ये एवम् एतत् विदुः, ये च अमी अरण्ये श्रद्धाम् [आस्थाय] सत्यम् उपासते, ते अर्चिः अभिसम्भवन्ति । अर्चिषः अहः [अभिसम्भवन्ति]; अह्नः आपूर्यमाणपक्षम् [अभिसम्भवन्ति]; आपूर्यमाणपक्षात् यान् षण्मासान् आदित्यः उदङ् एति, [तान् अभिसम्भवन्ति]; मासेभ्यः देवलोकम् [अभिसम्भवन्ति]; देवलोकात् आदित्यम् [अभिसम्भवन्ति]; आदित्यात् वैद्युतम् [अभिसम्भवन्ति] । मानसः पुरुषः एत्य तान् वैद्युतान् ब्रह्मलोकान् गमयति । ते पराः [सन्तः] तेषु ब्रह्मलोकेषु परावतः [संवत्सरान्] वसन्ति; तेषाम् पुनरावृत्तिः न [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
“जो इस प्रकार यह जानते हैं और जो वन में श्रद्धा तथा सत्य की उपासना करते हैं, वे ज्वाला को प्राप्त होते हैं; ज्वाला से दिन को; दिन से बढ़ते चन्द्र-पक्ष को; बढ़ते पक्ष से उन छह महीनों को जिनमें सूर्य उत्तर की ओर जाता है; उन महीनों से देवलोक को; देवलोक से सूर्य को; सूर्य से विद्युत्-लोक को। उन विद्युत् तक पहुँचे हुए लोगों के पास मन से उत्पन्न पुरुष आता है और उन्हें ब्रह्मलोकों में ले जाता है। वे उन ब्रह्मलोकों में अत्यन्त दूर तक, दीर्घ कालों तक निवास करते हैं। उनका फिर लौटना नहीं होता।”
English meaning
“Those who know this in this way, and those in the forest who contemplate faith and truth, reach flame; from flame, day; from day, the waxing fortnight; from that fortnight, the six months during which the sun travels north; from those months, the world of the gods; from the world of the gods, the sun; from the sun, the realm of lightning. A mind-born person comes to those who have reached lightning and leads them to the worlds of Brahman. They dwell in those worlds of Brahman across the farthest reaches, for far-extending periods. For them there is no return.”
व्याख्या
क्रम में ज्वाला, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के छह महीने, देवलोक, सूर्य और विद्युत् अलग पड़ाव हैं। मानस पुरुष मार्गदर्शक है। ब्रह्मलोकों का बहुवचन और पुनरावृत्ति का निषेध दोनों सुरक्षित हैं; अवधि सम्बन्धी पराः परावतः कठिन पद है।
Explanation
Flame, day, waxing fortnight, the six northern months, the divine world, sun and lightning are distinct stages. The mind-born person is a guide. Both the plural worlds of Brahman and the denial of return are retained; the duration phrase parah paravatah is difficult.
संदर्भ
यह देवयान मार्ग का उत्तर है। ज्ञान रखने वाले और वन में श्रद्धा-सत्य की उपासना करने वाले एक ही आरोही क्रम में बताए गए हैं।
Context
This answers the question about the path of the gods. Knowers and forest contemplatives of faith and truth share the same ascending sequence.