Passage 19.17
यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ्न वेद यस्य वाक्शरीरं यो वाचमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ १७ ॥
पदच्छेद
अन्वय
यः वाचि तिष्ठन् वाचः अन्तरः [अस्ति], यम् वाक् न वेद, यस्य वाक् शरीरम् [अस्ति], यः अन्तरः वाचम् यमयति, एषः ते आत्मा अन्तर्यामी अमृतः [अस्ति] ।
हिन्दी अर्थ
जो वाणी में स्थित है, वाणी के भीतर है, जिसका ज्ञान वाणी को नहीं है, जिसका शरीर वाणी है और जो वाणी को भीतर से नियन्त्रित करता है, वही तुम्हारा आत्मा, अमर अन्तर्यामी है।
English meaning
The one who stands in speech, who is within speech, whom speech does not know, whose body is constituted by speech, and who rules speech from within: that is your Self, the immortal inner ruler.
व्याख्या
वाणी अनेक नाम कह सकती है, पर अपने अन्तर्यामी को उसी तरह विषय नहीं बना सकती। यह नाम की सीमा को स्मरण कराता है।
Explanation
Speech can utter many names, yet cannot thereby turn its ruler into an ordinary named object. The passage recalls the limits of naming.
संदर्भ
अन्तर्यामी-क्रम में अब वाणी का वर्णन है।
Context
The inner-ruler sequence now concerns speech.