Shloka 4.1
श्रीभगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥४-१॥
पदच्छेद
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच-अहम् इमम् अव्ययम् योगम् विवस्वते प्रोक्तवान् । विवस्वान् मनवे प्राह; मनुः इक्ष्वाकवे अब्रवीत् ।
हिन्दी अर्थ
भगवान ने कहा: मैंने यह अविनाशी योग विवस्वान को बताया था। विवस्वान ने मनु को बताया और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।
English meaning
The Lord said: I taught this enduring yoga to Vivasvan. Vivasvan passed it to Manu, and Manu told Ikshvaku.
प्रसंग
कृष्ण चौथे अध्याय में इस योग की शिक्षापरम्परा बताते हैं। अर्जुन को दिए जा रहे उपदेश का इसी क्रम से सम्बन्ध जोड़ा गया है।
सरल व्याख्या
परम्परा का उल्लेख अभ्यास को केवल अभी बना विचार मानने से रोकता है। यहाँ योग को सिखाए और सीखे जाने वाले बोध के रूप में रखा गया है।
Context
Krishna opens this chapter by describing the transmission of yoga and connecting the present teaching to it.
Simple explanation
The reference to transmission presents yoga as something taught and learned, rather than a newly improvised idea.