Passage 43.7
ते हेमे प्राणा अहंश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुः । तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति । तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदं शरीरं पापियो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७ ॥
पदच्छेद
अन्वय
ते ह इमे प्राणाः अहंश्रेयसे विवदमानाः ब्रह्म जग्मुः । तत् [ब्रह्म] ह, नः कः वसिष्ठः [अस्ति] इति ऊचुः । तत् [ब्रह्म] ह, वः यस्मिन् उत्क्रान्ते [लोकः] इदम् शरीरम् पापीयः मन्यते, सः वः वसिष्ठः [अस्ति] इति उवाच ।
हिन्दी अर्थ
ये प्राण, अर्थात् शरीर की शक्तियाँ, “मैं अधिक श्रेष्ठ हूँ” इस बात पर विवाद करते हुए ब्रह्म के पास गए। उन्होंने पूछा, “हममें सबसे उत्कृष्ट कौन है?” ब्रह्म ने कहा, “तुममें जिसके निकल जाने पर यह शरीर अधिक बुरी दशा में माना जाए, वही तुममें सबसे उत्कृष्ट है।”
English meaning
These vital powers, disputing over “I am the better one,” went to Brahman. They asked, “Which of us is the most excellent?” Brahman answered, “Whichever of you, on departing, causes this body to be regarded as worse off is the most excellent among you.”
व्याख्या
यह शरीर की परस्पर निर्भर शक्तियों की रूपकात्मक परीक्षा है। ब्रह्म यहाँ संवाद करने वाला प्राधिकार है, जिसे परम्परा प्रजापति से पहचानती है; मूल में प्रजापति नाम नहीं जोड़ा गया है।
Explanation
This is an allegorical test of mutually dependent bodily powers. Brahman is the speaking authority, traditionally identified with Prajapati; that name is not added to the base text.
संदर्भ
गुणों की सूची अब बोलती हुई इन्द्रियों की कथा बनती है। ब्रह्म तत्काल विजेता नहीं बताता, बल्कि अलग होने की परीक्षा देता है।
Context
The list of qualities becomes a story of speaking faculties. Brahman does not simply announce a winner, but proposes a test of departure.